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श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार - पद्यानुवाद

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  श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार - पद्यानुवाद (दोहा ) बाह्यान्तर लक्ष्मी सहित, वर्धमान जिनराज। ‘ज्ञायक’ लोकालोक के, नमन उन्हें शतबार।।1।। स्वर्ग मोक्ष का सुख मिले, बाधा रहित वचन। दुःख न किंचित् मात्र हो, ऐसा कहूँगा धर्म।।2।। सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण, जिनवर कहिये धर्म। यातैं जो विपरीत है, वे सब ही हैं कुधर्म ।।3।। देव शास्त्र गुरु शरण गहे, सम्यक् हो श्रद्धान। शास्त्रानुसार आचरण करे, सम्यग्दृष्टि जान ।।4।। वीतराग सर्वज्ञता, हित उपदेशक जान। निश्चय से गुरुवर कहे, उनको आप्त बखान।।5।। भूखप्यास अरु जन्म मरण, आदि अठारह दोष। जिनको ये नहीं होत हैं, सच्चे आप्त हैं होत।।6।। परम इष्ट ज्योति विराग, विमल कृती व सार्व। नादि मध्यान्त सर्वज्ञ, अष्ट नाम है आप्त।।7।। ज्यों शिल्पी कर बजे मृदंग, कुछ भी न चाह करे। त्यों हि राग रहित प्रभु, हित उपदेश खिरे ।।४।। वीतराग सर्वज्ञ कथित, बाधा रहित है बैन। सच्चा सब उपदेश है, जिनवाणी है ऐम।।9।। विषयकषाय आरंभ अरु, परिग्रह रहित है जे। ज्ञान ध्यान में रत रहे, सच्चे गुरु हैं वे।।10।। जैसे आप्त आगम गुरु, उनका स्वरूप है जो। वैसा ही श्रद्धान कर, नि:शंकित है वो ।।11।। इन्द्रिय सु...