Sunday, September 6, 2026

नित्य नियम पूजा पीठिका की वचनिका

 

पं. सदासुखदास जी कासलीवाल कृत

नित्य नियम पूजा पीठिका की वचनिका

ॐ नमः सिद्धेभ्य:

मूल पाठ अथ नित्य नियम पूजन की वचनिका लिख्यते।

सरलार्थ - अब नित्य-नियम से किए जाने वाले पूजन की वचनिका लिखी जाती है।

जय जय जय

मूल पाठ - हे जिनेंद्र‌ हमारे ह्रदय में आप जयवंता रहो जयवंता रहो जयवंता रहो।।

ऐसे तीन बार उच्चारणकरि। जिनेंद्र के सर्वोत्कृष्टपनां अर अपनें परिणाम में अति आदर प्रगटकीया है। अथवा इस कालमें आप ही जयवंते प्रवर्तो।

आपका धर्म का उद्योत नहीं। तहां हेय उयादेय का त्यागग्रहण में सर्वप्रकार अंधकार ही है ।।

सरलार्थ - हे जिनेन्द्र! आप मेरे हृदय में सदैव जयवंत रहें, जयवंत रहें, जयवंत रहें।”

इस प्रकार तीन बार उच्चारण करके जिनेन्द्र भगवान की सर्वोत्कृष्टता के प्रति अपने परिणामों में अत्यंत आदर प्रकट किया गया है। अर्थात् इस काल में आप ही जयवंत होकर प्रवर्तमान रहें।

जहाँ आपके धर्म का प्रकाश नहीं है, वहाँ हेय और उपादेय—अर्थात् छोड़ने योग्य और ग्रहण करने योग्य वस्तुओं के त्याग और ग्रहण में—हर प्रकार का अज्ञानरूपी अंधकार ही छाया हुआ है।

नमोस्तु। नमोस्तु। नमोस्तु।

मूल पाठ - आपके अर्थि हमारा नमस्कार होहु ।। नमस्कार होहु। ॥ नमस्कार होहु ।।

ऐसे तीनवार कहिने करि अपनां अतिविनय पूर्वक समस्त काल में वंदना का भाव प्रगट कीया ॥ अथवा तीन लोक में तीन काल में सम्यग्दृष्टी निके नमस्कार करने योग्य आप जिनेंद्र विनां अन्य कोऊ हे नहीं। ताते हमारे आपके गुणनि ही में नित्य वंदना होहु॥ अन्य रागी द्वेषी मोहीन मैं मेरा विनय प्रसंसादिक इसजन्म में वा अन्य जन्म मैं मति होहु ।।

सरलार्थ - हे जिनेन्द्र भगवान!आपके प्रति हमारा नमस्कार हो। नमस्कार हो। नमस्कार हो।

इस प्रकार तीन बार कहकर अपना अतिविनय पूर्वक समस्त काल में वंदना करने का भाव प्रगट किया। अथवा तीनलोक-तीनकाल में सम्यग्दृष्टि जीवों द्वारा नमस्कार करने योग्य आप जिनेन्द्र भगवान के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। इसलिए हमारे द्वारा आपके गुणों में ही नित्य वंदना होती रहे। अन्य रागी-द्वेषी, मोही जीवों के प्रति मेरा विनय, प्रशंसादिक इस जन्म में व अन्य जन्म में भी न हो।।

णमो अरिहंताणं  णमो सिद्धाणं  णमो आयरियाणं।

णमो   उवज्झायाणं      णमो   लोए   सव्वसाहूणं।।

मूल पाठ - अरहंतनिके अर्थि नमस्कार होहु।। सिद्धनि के अर्थि नमस्कार होहु ।। आचार्यनिके अर्थि नमस्कार होहु॥ अथवा अरहंतनि कूं नमस्कार होहु।। सिद्धन को। आचार्यनिकों ।। उपाध्यायनिकों ।। सर्वसाधुनिकूं ॥ नमस्कार होहु।

ऐसे षष्टी विभक्ति करि वा चतुर्थी कर वंदनां करी है।

इहां कोऊ कहै अरहंतादिक निकें तो सर्वपद विशेषण नहीं कहा अर साधुनिकेही सर्व पद कैसे कहा।।

ताका अर्थ मूलाचार, गाथा - 512 में वट्टकेर स्वामी ऐसा कहा है

णिव्वाण साधए जोगे सदा जुंजति साधव:।

समा सव्वेसु भूदेसु तम्हा ते सव्व साधव:।।

निर्वाण के साधक जे योग कहिये ध्यान एकाग्रता तिनमें। आत्माकूं सदाकाल युक्त करैं तातें साधु कहिए हैं। अर सर्व कहिए समस्त जे एकेंद्रियादिक जीवनिमें समा कहिए। साम्यभाव जो परम वीतरागता धारण करी तातें सर्व साधु कहिए हैं।

सरलार्थ - अरहंतों के प्रति नमस्कार हो। सिद्धों के प्रति नमस्कार हो। आचार्यों के प्रति नमस्कार हो। उपाध्यायों के प्रति नमस्कार हो। सर्व साधुओं के प्रति नमस्कार हो।

इस प्रकार षष्ठी विभक्ति (“के प्रति/के”) अथवा चतुर्थी विभक्ति (“को”) का प्रयोग करके वंदना की गई है।

यहां कोई कहे कि अरहन्तादिक के तो सर्वपद विशेषण नहीं कहा तो केवल साधुओं के ही सर्व पद विशेषण क्यों कहा ?

इसका अर्थ मूलाचार, गाथा - 512 में वट्टकेर स्वामी ने ऐसा कहा है –

णिव्वाण साधए जोगे सदा जुंजति साधव:।

समा सव्वेसु भूदेसु तम्हा ते सव्व साधव:।।

गाथा का सरलार्थ -  जो निर्वाण के साधक हैं, वे योग, ध्यान और एकाग्रता आदि में आत्मा को सदा संलग्न रखते हैं, इसलिए उन्हें साधु कहा जाता है। और “सर्व” से समस्त साधु अभिप्रेत हैं, जो एकेन्द्रिय आदि सभी जीवों के प्रति समभाव रखते हैं। उन्होंने साम्यभाव अर्थात् परम वीतरागता को धारण किया है, इसलिए उन्हें “सर्व साधु” कहा जाता है।

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चत्तारि मंगलं - अरहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं।

साहू मंगलं,   केवल पण्णत्तो  धम्मो मंगलं।

मूल पाठ - लोक में च्यारि मंगलहे मं जो पाप ताहि गालयति कहिए, विध्वंस करै, तथा मेरा जो सुख ताहि लाति कहिए, देवे, सो मंगल है।॥ इहां पाप का नाश करणे वाला अर आत्मीक सुख का देने वाले ए च्यारि ही मंगल है ।। अरिहंत, सिद्ध अर साधुत्रय अर केवली प्रणीत धर्म इनि सिवाय अन्य कोऊ मंगल हैही नहीं ।।

सरलार्थ - लोक में चार मंगल है मं अर्थात् जो पाप को गलाए उसका विध्वंस करे तथा मंग जो सुख देने वाला है वह मंगल है। यहां पाप का नाश करने वाला और आत्मिक सुख को देने वाले ये चार ही मंगल है।

अरिहंत, सिद्ध, साधुत्रय (आचार्य, उपाध्याय, साधु) और केवली प्रणीत धर्म के सिवाय अन्य कोई मंगल नहीं है।

चत्तारि लोगुत्तमा - अरहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा।

साहू लोगुत्तमा,   केवल पण्णत्तो   धम्मो   लोगुत्तमा।

मूल पाठ - ए। च्यारि ही लोक में उत्तम हैं, सर्वोत्कृष्ट हैं अरिहंत लोकविषैं उत्तम है। सिद्धहैं तेलोक में उत्तम हैं, साधु‌ कहिए, आचार्य उपाध्याय सर्वसाधु‌ ए लोकविषैं उत्तम हैं। केवली भगवान करि कहा धर्म है सो लोक में उत्कृष्ट है।

सरलार्थ - चार ही लोक में उत्तम है,सर्वोत्कृष्ट है अरिहंत लोक में उत्तम हैं, सिद्ध लोक में उत्तम हैं, साधु अर्थात् आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु लोक में उत्तम हैं, केवल भगवान द्वारा कहा धर्म लोक में उत्तम है।

चत्तारि सरणं पव्वज्जामि - अरिहंत सरणं पव्वज्जामि।

सिद्ध   सरणं   पव्वज्जामि,   साहू   सरणं पव्वज्जामि।

केवल       पण्णत्तो      धम्मो     सरणं   पव्वज्जामि।

मूल पाठ - ए च्यारि सरण हैं तिनकूं में प्राप्त होत हूं अरहंतन के सरण कूं प्राप्त होत हूं, सिद्धनके सरणकूं प्राप्त होत हूं, साधुनि का त्रय सरणकूं प्राप्त होत हूं, केवली प्रणीत धर्म के सरणकूं प्राप्त होत हूं।

सरलार्थ - मैं इन चार की शरण में जाता हूं समस्त अरहंतों की शरण में जाता हूं, समस्त सिद्धों की शरण में जाता हूं, समस्त साधुत्रय (आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु) की शरण में जाता हूं, केवली भगवान द्वारा कहे हुए धर्म की शरण में जाता हूं।

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मंगल विधान

अपवित्रः पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा |

ध्यायेत्पंच-नमस्कारं        सर्वपापैः प्रमुच्यते ||

मूल पाठ - बाह्य शरीर पवित्र होहु अथवा अपवित्र होहु सुखरूप तिष्ठता होहु तथा दुःख रूप तिष्ठता होहु जो पंच नमस्कार पदनिनै ध्यावे हैं सो समस्त पाप करि छूटियै हैं।

सरलार्थ - बाह्य शरीर पवित्र हो या अपवित्र, सुख की अवस्था में हो या दुःख की अवस्था में जो पंचनमस्कार पदों (णमोकार मंत्र) को ध्याता है। वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

अपवित्रः पवित्रो    वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा |

यः स्मरेत्परमात्मानं     स बाह्याभ्यंतरे शुचिः |

मूल पाठ - शरीर अपवित्र होहु। वा जलादिक तें धोया पवित्र होहू ॥ तथा सयन करता। तथा वैठा उठा चालता भोजन करता लेता देता धरता मेलता आरंभादिक करता। वा नहीं करता। इत्यादिक सर्व अवस्थानै प्राप्त हूवा। भी। जो परमात्माने स्मरण ध्यान करै है। सो बाह्य अभ्यंतर। सर्व प्रकार पवित्र है।

सरलार्थ -  शरीर अपवित्र हो जाए अथवा जल आदि के द्वारा धोने से पवित्र हो जाए; इसी प्रकार सोते हुए, बैठे हुए, उठते हुए, चलते हुए, भोजन करते हुए, वस्तु को लेते हुए, देते हुए, रखते हुए, मिलाते हुए तथा आरम्भ आदि कार्य करते हुए या उन कार्यों को न करते हुए—अर्थात् इस प्रकार की सभी अवस्थाओं को प्राप्त होने पर भी जो जीव परमात्मा का स्मरण और ध्यान करता है, वह बाह्य और आभ्यंतर—दोनों प्रकार से सर्वथा पवित्र है।

भावार्थ – मूल पाठ- देहतो सप्त धात मय महा असुचि है।॥ ताकूं (मिथ्यादृष्टी। जलतें धोय पवित्र मानै हैं।। सो जलही महा अपवित्र यातें मल का भरा फूटा घडा समान। नवद्वारनितै मलकूं श्रवता देह।। पवित्रहोय नहीं देह कूँ स्नान मात्रतें पवित्र मानें सो मिथ्याअभिप्राय है अर परमात्मा का ध्यांनकरि आत्मा का तो समस्त पाप मल नष्ट होय है।॥ अर हाड मांसमय देह कूं हू देवेंद्र मुनींद्रनि करि पूज्य होय है। तातें बाह्य अभ्यंतर सुध करने वाला एक परमात्मा सरूप मैं राचजा नांही है अन्य नहीं है

भावार्थ का सरलार्थ - देह सात धातुओं से बनी हुई है और अत्यन्त अपवित्र है। उस देह को मिथ्यादृष्टि जीव जल आदि से धोकर पवित्र मानता है। लेकिन जिस जल से वह देह को धोकर पवित्र मानता है, वही जल वास्तव में अत्यन्त अपवित्र है; क्योंकि वह मल से भरे हुए और फूटे हुए घड़े के समान है। इस देह के नौ द्वारों से निरन्तर मल आदि अशुचि पदार्थ निकलते रहते हैं। इसलिए केवल स्नान करने मात्र से यह देह वास्तव में पवित्र नहीं हो सकती। देह को मात्र स्नान के द्वारा पवित्र मानना मिथ्या अभिप्राय है।

इसके विपरीत, परमात्मा का ध्यान करने से आत्मा के समस्त पापरूपी मल का नाश होता है। और इसी हाड़-मांस से बनी देह के द्वारा भी देवेंद्र और मुनींद्र जैसे महान पुरुष पूज्य हुए हैं। अतः बाह्य और आभ्यंतर—दोनों प्रकार की शुद्धि करने वाला वास्तव में एक परमात्मस्वरूप आत्मा ही है। इसलिए उसी आत्मस्वरूप परमात्मा में रमण करो; उसके अतिरिक्त बाह्य शुद्धि का कोई अन्य वास्तविक साधन नहीं है।

अपराजित-मंत्रोऽयं,    सर्व-विघ्न-विनाशनः |

मंगलेषु      सर्वेषु,    प्रथमं   मंगलमं मतः ||

मूल पाठ यो पंचनमस्कार मंत्र है सो किसी मिथ्यादृष्टीनिकै मंत्र तंत्र अन्य विद्या देवतानिकरि खंडया नहीं जाय है। याते अपराजित है अर समस्त मिथ्यादृष्टी व्यंतर भूत पिशाच  मंत्र मुद्रादिक निकरि कीया विघ्न का नाश करने वाला है। अर या मंत्र कूं समस्त मंगलरूप कार्यनि मैं प्रधान मुख्य मंगल भगवान का आगम मैं कहा है।

सरलार्थ - यह पंच नमस्कार मंत्र ऐसा है कि किसी मिथ्यादृष्टि के मंत्र, तंत्र, अन्य विद्याओं अथवा देवताओं द्वारा इसे खंडित नहीं किया जा सकता। इसलिए यह ‘अपराजित’ है। यह समस्त मिथ्यादृष्टि व्यंतर देवों, भूत-पिशाचों तथा उनके मंत्र-मुद्रादि द्वारा किए गए विघ्नों का नाश करने वाला है।

इस मंत्र को सभी प्रकार के मंगलमय कार्यों में प्रधान और मुख्य मंगल कहा गया है। भगवान के आगम में भी इसे सर्वश्रेष्ठ मंगल के रूप में बताया गया है।

एसो   पंच-णमोयारो, सव्व-पापपणासणो |

मंगलाणं   सव्वेसिं,  पढमं होय मंगलम् ||

मूल पाठयो पंच नमस्कार मंत्र है सो समस्त पाप का नाश करने वाला है अर समस्त मंगलनि मैं प्रधान मंगल है।

सरलार्थ - यह पंच नमस्कार मंत्र समस्त पापों का नाश करने वाला है और सभी मंगलों में सबसे श्रेष्ठ एवं प्रधान मंगल है।

अर्हमित्यक्षरं    ब्रह्म,    वाचकं     परमेष्ठिनः |

सिद्धचक्रस्य    सद्बीजं   सर्वतः प्रणमाम्यहम् ||

मूल पाठ - अर्हं ऐसा दो अक्षर हैं सो ब्रह्म जो अर्हंत ताका कहने वाला है अर परम इष्ट जो सिद्ध समूह ताके होने का वीज है यातैं मैं अर्हं इन दोय अक्षरनि कौं समस्त काल में नमस्कार करूं हूं।

सरलार्थ - ‘अर्हं’ ये दो अक्षर हैं। ये ‘ब्रह्म’ अर्थात् अर्हंत भगवान का बोध कराने वाले हैं और परम इष्ट अर्थात् सिद्धों के समूह के होने का बीज हैं। इसलिए मैं ‘अर्हं’ इन दो अक्षरों को सभी काल में नमस्कार करता हूँ।

कर्माष्टक-विनिर्मुक्तं   मोक्ष-लक्ष्मी-निकेतनम् |

सम्यक्त्वादि-गुणोपेतं    सिद्धचक्रं नमाम्यहम् ||

मूल पाठ - जे अष्ट कर्म करि छूटि गया अर मोक्ष की अविनाशीक अनंत चतुष्टय रूप लक्ष्मी का स्थानक अर सम्यक्तादि अनंत गुणनिकरि संयुक्त ऐसा सिद्धन का समूह कूं नमस्कार करूं हूं।

सरलार्थ - जो अष्ट कर्मों से पूर्णतः मुक्त हो गए हैं, जो मोक्ष की अविनाशी अनंत चतुष्टय रूपी लक्ष्मी के स्थान हैं और जो सम्यक्त्व आदि अनंत गुणों से युक्त हैं, ऐसे सिद्धों के समूह को मैं नमस्कार करता हूँ।

विघ्नौघाः प्रलयं यान्ति,  शाकिनी भूत पन्नगाः |

विषं   निर्विषतां   याति  स्तूयमाने    जिनेश्वरे ||

सरलार्थ - जिनेन्द्र भगवान की स्तुति करने से समस्त विघ्न समूह नष्ट हो जाते हैं। शाकिनी (डाकिनी) भूत और सर्पों का भय नहीं रहता तथा विष भी अपना विषैला प्रभाव खोकर निर्विष हो जाता है।

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पूजा प्रतिज्ञा पाठ

श्रीमज्जिनेन्द्रमभिवंद्य जगत्त्रयेशम्,

स्याद्वाद-नायक-मनंत-चतुष्टयार्हम् |

श्रीमूलसंघ-सुदृशां सुकृतैकहेतुर्,

जैनेन्द्र-यज्ञ-विधिरेष मयाऽभ्यधायि ||

मूल पाठ - पूजन करने का इच्छुक है, सो पूजन का आदि में ऐसी प्रतिज्ञा करै है में जो हूं सो तीन जगत का स्वामी अर स्याद्वाद विद्या का नायक अर अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंतवीर्य करि युक्त ऐसे श्री मत् कहिए समवशरणादि लक्ष्मी अर अनंतगुणरूप आत्मलक्ष्मी का धारक ऐसा जिनेन्द्र जो है ताहि नमस्कार करिके अर जिनेंद्र को यज्ञ जो पूजन ताकी विधि जो है ताहि अभ्युदय कहिए करत हूं। कैसा है जिनेंद्र का पूजन का विधि श्री मूलसंघ के जे सम्यग्दृष्टी जन तिनके पुण्य का अद्वितीय कारण है।

सरलार्थ - जो व्यक्ति पूजन करने का इच्छुक है, वह पूजन के आरंभ में यह प्रतिज्ञा करता है—

मैं उस जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार करके जिनेन्द्र भगवान की पूजन-विधि करता हूँ, जो तीनलोक के स्वामी हैंस्याद्वाद विद्या के नायक हैं और अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख तथा अनंत वीर्य से युक्त हैं। वे समवशरण आदि की दिव्य शोभा तथा अनंत गुणों से युक्त आत्मिक संपदा के धारक हैं। ऐसे जिनेन्द्र भगवान की पूजा की जो विधि है, उसका मैं विधिपूर्वक पालन करता हूँ। यह जिनेन्द्र भगवान की पूजा की विधि श्री मूलसंघ के सम्यग्दृष्टि साधु-सज्जनों के पुण्य का अद्वितीय कारण है।

भावार्थ – मूल पाठ- आतम ज्ञान रूप लक्ष्मी को मूल कहिए कारण ऐसो जो जिनधर्मीनिको संघ कहिए समूह तिनमें सम्यग्दृष्टीनिके सातिसय पुण्य बंध कौ कारण ऐसो जो जिनेंद्र को पूजन है सो मैं करूं हूं। मिथ्यादृष्टी भी हर्ष सहित करै तिनके पुण्यबंध होय है। अर सम्यग्दृष्टीनिके संसार की स्थितिकूं नाश करने वाला सातिसय पुण्यबंध जिनेंद्र के पूजनतैं होय है।

भावार्थ का सरलार्थ - आत्मज्ञान रूपी लक्ष्मी को मूल अर्थात् सर्वोच्च कारण मानने वाले, जिनधर्म में स्थित लोगों के समूह को संघ कहा जाता है। उस संघ में जो सम्यग्दृष्टि व्यक्ति हैं, उनके विशेष/अत्यधिक पुण्य के बंध का कारण जो जिनेन्द्र भगवान की पूजा है, वह मैं करता हूँ।

जो मिथ्यादृष्टि व्यक्ति भी जिनेन्द्र भगवान की पूजा हर्ष और श्रद्धा के साथ करता है, उसके भी पुण्य का बंध होता है। लेकिन सम्यग्दृष्टि व्यक्ति के लिए जिनेन्द्र भगवान की पूजा से ऐसा विशेष पुण्यबंध होता है, जो उसके संसार में भटकने की स्थिति को नष्ट करने में सहायक होता है।

स्वस्ति त्रिलोक-गुरवे जिन-पुंगवाय,

स्वस्ति स्वभाव-महमोदय-सुस्थिताय |

स्वस्ति प्रकाश-सहजोर्ज्जित दृग्मयाय |

स्वस्ति प्रसन्न-ललिताद्भुत-वैभवाय ||

मूल पाठ - तीन लोक का गुरु ऐसा जो जिन प्रधानता के अर्थि स्वस्ति कहिए कल्याण होहु। अर आत्मीक स्वभाव की महिमा के उदय मैं सुखरूप स्थिति ऐसे जिन के अर्थि स्वस्ति कहिए कल्याण होहु। बहुरि प्रकाश करि स्वभावहीतैं महान केवलदर्शनमय जिनेन्द्र ताके अर्थि स्वस्ति होहु। बहुरि उज्जवल अर ललित कहिए सुंदर अद्भुत विभव का धारक जिनेन्द्र के अर्थि स्वस्ति होहु।

सरलार्थ - तीनों लोक के गुरु, जिनमें जिनेन्द्र भगवान की प्रधानता है और जो कल्याण के इच्छुक हैं, उनका कल्याण हो। जिनका आत्मिक स्वभाव अपनी महिमा के प्रकट होने पर सुखस्वरूप अवस्था को प्राप्त होता है, ऐसे जिनेन्द्र भगवान का कल्याण हो। फिर, जो अपने स्वभाव से प्रकाशित हैं और महान केवलज्ञान एवं केवलदर्शन से युक्त हैं, ऐसे जिनेन्द्र भगवान का कल्याण हो। और जो अत्यंत उज्ज्वल, सुंदर, मनोहर तथा अद्भुत दिव्य वैभव से युक्त हैं, ऐसे जिनेन्द्र भगवान का भी कल्याण हो।

स्वस्त्युच्छलद्विमल-बोध-सुधा-प्लवाय,

स्वस्ति स्वभाव-परिभाव-विभासकाय |

स्वस्ति त्रिलोक-विततैक-चिदुद्गमाय,

स्वस्ति त्रिकाल-सकलायत-विस्तृताय ||

मूल पाठ - उछलता है केवलज्ञान रूप अमृत का प्रवाह ताकै ऐसा जिनेन्द्र के अर्थि स्वस्ति होहु। अर स्वभाव परभाव का प्रकाशक जिनेन्द्र के अर्थि स्वस्ति होहु। बहुरि त्रिलोक मैं विस्तारनै प्राप्त भया है चैतन्य का उदय ऐसा जिनेन्द्र के अर्थि स्वस्ति होहु। बहुरि तीनकाल संबंधी समस्त पदार्थनिविषैं ज्ञानकरि विस्तारनै प्राप्त हूवा ऐसा जिनेन्द्र के अर्थि स्वस्ति होहु।।

इहां स्वस्ति शब्द है तो कल्याण क्षेम मंगल इत्यादि अर्थ मैं है, सो सर्वोत्कृष्ट परम उपकारक जिनेन्द्र के अर्थि स्वस्ति शब्द रूप कहि करि अपनी भक्ति प्रगट करी है। जो है जिनेन्द्र आप जयवंता प्रवर्तो। जैसे राजानिकै अर्थि आनिंदित हो वृद्धिने प्राप्त हो फलोफूलो, इत्यादिक आशीर्वादादिकतैं अति भक्ति जाननी। तैसें जिनेन्द्र तौ कल्याणरूप, क्षेमरूप, मंगलरूप सर्वोत्कृष्ट स्वयमेव है। परन्तु अति भक्ति प्रेरणा करे है।

अथवा ऐसा भी अर्थ होय तो बहु ज्ञानीनिकूं विचारनां तीन लोक में महान् ऐसा तीर्थंकरपणा हमारे प्रगट होने के अर्थि जिनेन्द्र मंगलरूप, कल्याणरूप होहु। अर स्वभावके महिमाके उदय मैं स्थिर रहने के अर्थि स्वस्तिरूप होहु।

बहुरि आत्मीक प्रकाशकरि स्वभाविक दर्शनमय होने के अर्थि समस्त विघ्नहरो। बहुरि उज्जवल समस्तके मनोहर अद्भुत आत्मीक विभव का प्रगट होने के अर्थि स्वस्तिरूप होहु। उज्जवलता जो निर्मल केवलज्ञान रूप अमृत का प्रवाह उपजने के अर्थ जिनेन्द्र हमारे स्वस्तिरूप होहु। स्वभाव अर अन्य द्रव्यनिके भवके प्रकाशके अर्थि जिनेन्द्र हमारे स्वस्तिरूप होहु। बहुरि त्रिलोक्य मैं विस्तारता एक चैतन्य स्वभाव का उदय के अर्थि जिनेन्द्र हमारे स्वस्ति कहिए मंगलरूप होहु। बहुरि तीनकाल संबंधी समस्त पदार्थनिमैं ज्ञान का विस्तार के अर्थि स्वस्तिरूप होहु।

सरलार्थ - केवलज्ञानरूपी अमृत का प्रवाह उछलता हुआ प्रकट हो रहा है; ऐसे जिनेन्द्र के लिए स्वस्ति हो। अर्थात् जिनेन्द्र का कल्याण, क्षेम और मंगल हो। जो अपने स्वभाव तथा परभाव का प्रकाशक है, ऐसे जिनेन्द्र के लिए भी स्वस्ति हो। फिर जिसका चैतन्य का उदय तीनों लोकों में विस्तार को प्राप्त हुआ है, ऐसे जिनेन्द्र के लिए स्वस्ति हो। और जो तीनों कालों से सम्बन्धित समस्त पदार्थों को अपने ज्ञान के द्वारा जानकर उनके विषय में विस्तार को प्राप्त हुआ है, ऐसे जिनेन्द्र के लिए भी स्वस्ति हो।

यहाँ “स्वस्ति” शब्द का अर्थ कल्याण, क्षेम, मंगल आदि है। इस प्रकार सर्वोत्कृष्ट और परम उपकार करने वाले जिनेन्द्र के प्रति “स्वस्ति” शब्द का प्रयोग करके टीकाकार ने अपनी भक्ति प्रकट की है। भाव यह है कि—हे जिनेन्द्र! आप सदा जयवन्त होकर प्रवर्तित हों। जैसे किसी राजा के लिए प्रजा यह कहती है कि आप आनन्दित रहें, निरन्तर उन्नति को प्राप्त हों, फलें-फूलें आदि, और इस प्रकार के आशीर्वाद के शब्दों द्वारा अपनी अत्यन्त भक्ति प्रकट करती है, उसी प्रकार यहाँ जिनेन्द्र के प्रति “स्वस्ति” शब्द का प्रयोग अत्यन्त भक्ति के कारण किया गया है। वास्तव में जिनेन्द्र स्वयं ही कल्याणस्वरूप, क्षेमस्वरूप, मंगलस्वरूप और सर्वोत्कृष्ट हैं; फिर भी अत्यन्त भक्ति के कारण उनके लिए “स्वस्ति हो” ऐसा कहा गया है।

अथवा इसका एक दूसरा अर्थ भी किया जा सकता है। बहुत-से ज्ञानी पुरुषों के विचार में तीनों लोकों में महान् ऐसा तीर्थंकरत्व हमारे भीतर प्रकट हो, इस उद्देश्य से जिनेन्द्र हमारे लिए मंगलरूप और कल्याणरूप हों। अर्थात् जिनेन्द्र की भक्ति के प्रभाव से हमारे भीतर भी महान् तीर्थंकरपद प्रकट हो—ऐसी भावना है। इसी प्रकार आत्मा के स्वभाव की महिमा के उदय में स्थिर रहने के लिए जिनेन्द्र हमारे लिए स्वस्तिरूप हों। अर्थात् आत्मा के वास्तविक स्वभाव की महिमा प्रकट हो और उस स्वभाव में हमारी स्थिति स्थिर बनी रहे।

फिर आत्मिक प्रकाश को प्रकट करके स्वाभाविक दर्शनमय अवस्था को प्राप्त करने के लिए जिनेन्द्र हमारे समस्त विघ्नों को दूर करें। इसके बाद उज्ज्वल, सबके मन को प्रिय और अद्भुत आत्मिक वैभव के प्रकट होने के लिए जिनेन्द्र हमारे लिए स्वस्तिरूप हों। वह उज्ज्वलता ऐसी हो कि उससे निर्मल केवलज्ञानरूपी अमृत का प्रवाह उत्पन्न हो—इस उद्देश्य से भी जिनेन्द्र हमारे लिए स्वस्तिरूप हों। इसी प्रकार अपने स्वभाव और अन्य द्रव्यों के भावों का प्रकाश करने के लिए जिनेन्द्र हमारे लिए स्वस्तिरूप हों। फिर तीनों लोकों में विस्तार को प्राप्त होने वाले एक चैतन्यस्वभाव के उदय के लिए जिनेन्द्र हमारे लिए स्वस्तिरूप अर्थात् मंगलरूप हों। और अन्त में, तीनों कालों से सम्बन्धित समस्त पदार्थों के विषय में ज्ञान का विस्तार होने के लिए भी जिनेन्द्र हमारे लिए स्वस्तिरूप हों।

इस प्रकार यहाँ “स्वस्ति” शब्द के द्वारा केवल जिनेन्द्र के कल्याण की कामना नहीं की गई है, बल्कि भक्ति के कारण जिनेन्द्र को मंगलस्वरूप कहकर, उनके समान आत्मा में चैतन्य का  उदय, स्वभाव की महिमा, आत्मिक प्रकाश, निर्मलता, केवलज्ञानरूपी अमृत का प्रवाह, स्वभाव-परभाव का यथार्थ प्रकाश तथा तीनों कालों के समस्त पदार्थों को जानने वाले ज्ञान का विस्तार प्रकट होने की मंगलभावना भी व्यक्त की गई है।

भावार्थ – मूल पाठ- ऐसा जिनेन्द्र भगवान का आराधन तैं जिनेन्द्र कैसे गुण हमारे निर्विघ्न प्राप्त होहु।

भावार्थ का सरलार्थ - इस प्रका जिनेन्द्र भगवान की आराधना करने से, जिनेन्द्र भगवान के समान ही अनंत गुण, वे हमारे भीतर भी बिना किसी विघ्न के प्राप्त हों।

द्रव्यस्य शुद्धिमधिगम्य यथानुरूपम्,

भावस्य शुद्धिमधिकमधिगंतुकामः |

आलंबनानि विविधान्यवलम्ब्य वल्गन्,

भूतार्थ यज्ञ-पुरुषस्य करोमि यज्ञम् ||

मूल पाठ - देशकाल की योग्यता के अनुकूल जलचंदनादिक द्रव्यानिकी सुद्धिताकूं अवलंबन करिकै अर भावनिकी अधिक सुद्धता जो वीतरागता निर्वांछक ताके प्राप्त होने का इच्छुक में हूं सो नाना प्रकारके जिनेन्द्र गुणनिका स्तवन तथा ध्यान तथा प्रतिबिंब का अवलोकनादिक नाना प्रकारके अवलंबनि तिनका आलंबन ग्रहन करिके, अर सत्यार्थ जो पूज्य पुरुषता को यज्ञ जो पूजन ताहि करूं हूं।

सरलार्थ - मैं देश और काल की परिस्थिति के अनुकूल जल, चंदन आदि पूजा-द्रव्यों की शुद्धता को आधार बनाकर पूजा करता हूँ। साथ ही, मेरी भावना और अंतःकरण की अधिक से अधिक शुद्धता हो—अर्थात् वीतरागता और इच्छारहित अवस्था प्राप्त हो—ऐसी मेरी इच्छा है। इसके लिए मैं जिनेन्द्र भगवान के अनेक गुणों का स्तवन, उनका ध्यान, तथा उनके प्रतिबिंब (प्रतिमा) का दर्शन आदि अनेक प्रकार के साधनों का सहारा लेकर, उन साधनों को उचित रूप से ग्रहण करता हूँ।

और इस प्रकार जो वास्तव में पूजनीय पुरुषता है-अर्थात् जिनेन्द्र भगवान के वीतराग और आत्मिक गुणों की आराधना—उस रूपी यज्ञ अर्थात् पूजा को मैं करता हूँ।

भावार्थ – मूल पाठ- द्रव्यक्षेत्रादिकके योग्य तथा पुण्य के योग्य जलचंदनादिक द्रव्य वा वचन कायादिक सामग्री का अवलंबन करि पूज्य पुरुषनिका पूजन करूं हूं।

भावार्थ का सरलार्थ - देश, काल, परिस्थिति आदि के अनुकूल तथा अपने पुण्य के अनुसार जल, चंदन आदि पूजा की वस्तुओं और वचन, शरीर आदि से की जाने वाली पूजा-सामग्री का अवलंबन लेकर मैं उन पूज्य पुरुषों अर्थात् जिनेन्द्र भगवान की पूजा करता हूँ।

अर्हत्पुराण पुरुषोत्तम – पावनानि,

वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव |

अस्मिन् ज्वलद्विमल-केवल-बोधवह्रौ,

पुण्यं समग्रमहमेकमना जुहोमि ||

मूल पाठ हे अर्हन् हे पुराण पुरुषनि मैं उत्तम यो में पूजन करने वाला एक पुरुष हूं सो समस्त पवित्र वस्तु हैं तिननैं निश्चय करिके यो देदीप्यमान निर्मल केवलज्ञानरूप अग्नि ताविषैं समस्त पुण्यरूप जैसे होय तैसें एकाग्रमण हूवो हवन करूं हूं हौमूंहू़ं।

सरलार्थ - हे अर्हन्! हे पुराण पुरुष! मैं उत्तम भाव से आपकी पूजा करने वाला एक पुरुष हूँ। समस्त पवित्र वस्तुओं को निश्चित करके, इस देदीप्यमान और निर्मल केवलज्ञानरूपी अग्नि में समस्त पुण्यरूपी पदार्थों को, जैसे उचित हो, एकाग्र मन होकर हवन करता हूँ। मैं आहुति देता हूँ।

भावार्थ – मूल पाठ- अन्यमती बहिरात्मा है, ते पुण्य कें अर्थि अग्नि में हवनहीकूं पूजन, देवता को आराधन माने हैं सो मिथ्या है हिंसा प्रधान कर्म है।

जैनीनिकै घातियाकर्मरूप ईधनकूं दग्ध करि सकल का प्रकाशक केवलज्ञानहीकूं अग्नि संकल्प करिके अर जलचंदनादि उत्तम द्रव्यनिमैं हवन सामग्री का संकल्प करि समस्त परिद्रव्यनिमैं वांछादिकनिका अभाव के अर्थि क्षेपण करणें ही कूं हवन रूप संकल्प कीया।

जो अब हमारे जलादिक में वांछा का कारण कर्मजनित वेदना मति होहु भोजन फलादिकनिमैं वांछा का कारण वेदनीकर्म अर मोहनीय आंतरायादिक को अभाव होहु।

भावार्थ का सरलार्थ - अन्य मतों को मानने वाला बहिरात्मा है। वह पुण्य की प्राप्ति के लिए अग्नि में हवन करना, पूजा करना और देवता की आराधना करना मानता है। यह उसकी मिथ्या मान्यता है, क्योंकि ऐसा हवन हिंसा प्रधान कर्म है।

जैन दृष्टि से वास्तविक हवन यह है कि घातिया कर्मरूपी ईंधन को जला देने वाले, समस्त पदार्थों को प्रकाशित करने वाले केवलज्ञान को अग्नि के रूप में माना जाए। जल, चंदन आदि उत्तम द्रव्यों को हवन-सामग्री के रूप में माना जाए और समस्त पर-द्रव्यों में होने वाली इच्छा आदि के अभाव के लिए उनका क्षेपण किया जाए। यही वास्तविक हवन का संकल्प है।

भाव यह है कि - अब हमारे जल आदि पदार्थों में किसी प्रकार की इच्छा या आसक्ति उत्पन्न करने वाली कर्मजनित वेदना न हो; भोजन आदि विषयों में इच्छा उत्पन्न करने वाले वेदनीय कर्म का तथा मोहनीय, अंतराय आदि कर्मों का अभाव हो।

ॐ ह्रीं विधि यज्ञ प्रतिज्ञानाय जिन प्रतिमाग्रे परि पुष्पांजलि क्षिपेत्।

मूल पाठ - ऐसे पूजन करने वाला विधि पूर्वक पूजन की प्रतिज्ञाके अर्थि जिनप्रतिमाके अग्रभाग विषैं सर्वतरफतैं पुष्पनिकी अंजुलि क्षेपण करै।

सरलार्थ - इस प्रकार पूजा करने वाला व्यक्ति विधिपूर्वक पूजा करने की प्रतिज्ञा करके, जिनप्रतिमा के समक्ष चारों ओर से पुष्पों की अंजलि अर्पित करे।

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स्वस्ति मंगल विधान

श्री वृषभो न: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अजित:|

श्री संभव: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अभिनंदन:|

श्री सुमति: स्वस्ति, स्वस्ति श्री पद्मप्रभ:|

श्री सुपार्श्वः स्वस्ति, स्वस्ति श्री चन्द्रप्रभ:|

श्री पुष्पदंत: स्वस्ति, स्वस्ति श्री शीतल:|

श्री श्रेयांस: स्वस्ति, स्वस्ति श्री वासुपूज्य:|

श्री विमल: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अनंत:|

श्री धर्म: स्वस्ति, स्वस्ति श्री शांति:|

श्री कुंथु: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अरहनाथ:|

श्री मल्लि: स्वस्ति, स्वस्ति श्री मुनिसुव्रत:|

श्री नमि: स्वस्ति, स्वस्ति श्री नेमिनाथ:|

श्री पार्श्व: स्वस्ति, स्वस्ति श्री वर्द्धमान:|

मूल पाठ श्री जो अनंत चतुष्टयरूप अंतरंग लक्ष्मी अर समवशरणादिक बाह्य लक्ष्मीकरि युक्त भगवान चतुर्विंशति तीर्थंकर देव हैं तै ही तीनलोक मैं कल्याणरूप हैं, मंगलरूप हैं, क्षेपरूप हैं इनका ध्यानरूप भावनिकरि असातावेदनी कर्मनिका अर अंतराय कर्म का रस नष्ट हो जाय तदि समस्त दुःखनिका नाश होय अर आत्मीक निज शक्ति अरोक प्रगट होय है याते स्वस्ति रूप कहा है।

सरलार्थ - श्री अनंत चतुष्टय रूप अंतरंग लक्ष्मी तथा समवसरण आदि बाह्य लक्ष्मी से युक्त भगवान चतुर्विंशति तीर्थंकर देव तीनों लोकों में कल्याणस्वरूप, मंगलस्वरूप और क्षेमस्वरूप हैं।

उनका ध्यान करने से असाता वेदनीय कर्म और अंतराय कर्म का प्रभाव/रस नष्ट हो जाता है। इससे समस्त प्रकार के दुःखों का नाश होता है और आत्मा की अपनी स्वाभाविक शक्ति बिना किसी रुकावट के प्रकट होती है। इसी कारण तीर्थंकर भगवान को ‘स्वस्ति’ अर्थात कल्याण और मंगल का स्वरूप कहा गया है।

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परमर्षि स्वस्ति मंगल विधान

मूल पाठ अब महा ऋषनिका स्तवन रूप मंगल है सो दस काव्यनि विषैं पढ़ियै हैं।

सरलार्थ - अब महर्षियों का स्तवन (गुणगान) रूप मंगल है। उसे दस काव्यों के माध्यम से पढ़ना चाहिए।

नित्याप्रकंपाद्भुत-केवलौघा: स्फुरन्मन:पर्यय-शुद्धबोधा:|

दिव्यावधिज्ञान-बलप्रबोधा: स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठ ते परमऋषि हैं तैन: कहियै हम जै हैं तिनकै स्वस्ति क्रियासु: कहिए कल्याण करो। हमकूं नाश रहित करो, कैसे कहैं परमऋषि कैतेक तो अविनाशी अप्रकंप अद्भुत केवलज्ञान के धारक हैं। कैतेक देदीप्यमान मनपर्यय नाम सुद्ध ज्ञान के धारक हैं। कैतेक दिव्य जी अवधिज्ञान ता का बल करि बुद्धि हैं ज्ञाता हैं।

सरलार्थ - वे परम ऋषि हैं। उनके लिए कहा जाता है—हम उनके पास जाएँ और उनकी स्वस्ति/कल्याण की प्रार्थना करें। उनसे कहें—“हे प्रभु! हमारा कल्याण करें और हमें नाश से रहित करें।”

उन्हें परम ऋषि क्यों कहा जाता है? क्योंकि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अविनाशी, अचल, अद्भुत और केवलज्ञान के धारक हैं। कुछ ऐसे हैं जो तेजस्वी मनःपर्यय ज्ञान, अर्थात् दूसरों के मन के भावों को जानने वाले शुद्ध ज्ञान के धारक हैं। और कुछ ऐसे हैं जो दिव्य अवधिज्ञान के बल से वस्तुओं को जानने और उनके वास्तविक स्वरूप को समझने वाले ज्ञाता हैं।

                           

भावार्थ – मूल पाठ- सम्यक तप के प्रभाव तें योगीस्वरन के अष्टादश प्रकार बुद्धि रिद्ध उपजै है। ऋद्धि नाम आत्मा की शक्ति का है आत्मा की अनंत शक्ति है ते कर्मनि के उदय आच्छादित हैं।

जब सम्यक् तप के प्रभावतैं आवरणादिक कर्म का नाश होय है तदि आत्मीक शक्ति प्रगट होय है तिनमैं कैई ऋषि समस्त ज्ञानावरण का नाश करि केवलज्ञान उपजावे हैं,

कैतेक ज्ञानावरण के क्षयोपसमतैं मन:पर्यय नाम ऋद्धि तथा अवधिज्ञान नाम ऋद्धि को धारै है।

भावार्थ का सरलार्थ - सम्यक् तप के प्रभाव से योगीश्वर मुनियों में अठारह प्रकार की बुद्धि-ऋद्धियाँ उत्पन्न होती हैं। ‘ऋद्धि’ का अर्थ आत्मा की शक्ति है। आत्मा में अनंत शक्तियाँ विद्यमान हैं, लेकिन वे कर्मों के उदय के कारण ढकी हुई रहती हैं।

जब सम्यक् तप के प्रभाव से ज्ञानावरण आदि कर्मों का नाश या क्षय-उपशम होता है, तब आत्मा की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं। उन शक्तियों में से कुछ ऋषि समस्त ज्ञानावरणीय कर्म का नाश करके केवलज्ञान को प्रकट कर लेते हैं।

कुछ अन्य ऋषि ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम के कारण मनःपर्यय ज्ञान-ऋद्धि और अवधिज्ञान-ऋद्धि को धारण करते हैं।

कोष्ठस्थ-धान्योपममेकबीजं संभिन्न-संश्रोतृ-पदानुसारि |

चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानां स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठ 

१. कोष्ठस्थ धान्यौपम ऋद्धि  

२. वीज ऋद्धि 

३. संभिन्न-संश्रोतृ ऋद्धि  

४. पदानुसार ऋद्धि  जैसे च्यारि प्रकार का बुद्धिवलने धारण करते परम ऋषि हैं।

तेहमारे कल्याण करो। जैसे कोठारमै धारण किये अनेक धान्यादिक तथा रत्नादिकतेजव देखोवा निकाशो तदि जैसे धरेथैतैसेही निकसै परस्पर मिले नहीं घटे नहीं वढै नहीं। तैसे जो सिद्धांत सूत्रनिके अर्थि तथा पाठ तथा लोकीक वार्ता एकवार श्रवणकरि वा कही तिनकूं वहुत काल पाछे हू पूछियेतौ एक अक्षर घाटि वाढि वावधती नहीं कहैं। अक्षर आगे पाछे, एक हू नहिं पलटै ऐसा कौष्ट बुद्धि ऋद्धि तपकै प्रभावते उपजै है। वहुरि कोऊ ग्रंथ का एकवीजपदग्रहणकरि समस्त ग्रंथकूं जानना सो वीजऋद्धि है। वहुरि चक्रवर्तिकी सेना वारहयोजन लंवा नवजोजन चोडा क्षेत्र है मै तिनमें अनेक मनुष्य, हस्ती, घोडा, ऊंट, वलध पशुपक्षी है तिनका अनेक प्रकार शब्द होय है। तिनशब्दनकूं भिन्नभिन्न एक कालमें श्रवणकरिनेकी सक्तिरूप संभिन्न संश्रोतृऋद्धिहै। वहुरि ग्रंथका आदि का एकपद ग्रहणकरि समस्त ग्रंथकूं कहनां तथा मध्यके एक पदकूं ग्रहणकरि तथा अंतके एकपदकूं ग्रहणकरि समस्त ग्रंथके कहने की शक्ति सो पदानुसार नामकी ऋद्धि है।

सरलार्थ –

१. कोष्ठस्थ धान्यौपम ऋद्धि

२. बीज ऋद्धि 

३. संभिन्न-संश्रोतृ ऋद्धि

४. पदानुसार ऋद्धि इस प्रकार चार प्रकार की बुद्धि-ऋद्धियों को धारण करने वाले परम ऋषि होते हैं

वे हमारा कल्याण करें। जैसे कोठार में रखे हुए अनेक प्रकार के धान्य आदि तथा रत्न आदि को जब निकालकर देखते हो, तो जैसे उन्हें जिस प्रकार रखा गया था, उसी प्रकार वे निकलते हैं; आपस में मिलते नहीं, घटते नहीं और बढ़ते नहीं। उसी प्रकार जो सिद्धान्त-सूत्रों के अर्थ तथा पाठ और लौकिक बातें एक बार सुनकर या कहकर ग्रहण कर ली गई हों, उन्हें बहुत समय बाद भी यदि पूछा जाए, तो वे एक अक्षर भी कम या अधिक किए बिना कहते हैं। अक्षर आगे-पीछे नहीं होते और एक भी अक्षर नहीं बदलता। ऐसी कोश्ठ-बुद्धि ऋद्धि तप के प्रभाव से उत्पन्न होती है।

फिर किसी ग्रंथ के एक बीज-पद को ग्रहण करके सम्पूर्ण ग्रंथ को जान लेना, वह बीजऋद्धि है।

फिर चक्रवर्ती की सेना बारह योजन लंबी और नौ योजन चौड़ी भूमि में होती है। उसमें अनेक मनुष्य, हाथी, घोड़े, ऊँट, बैल तथा पशु-पक्षी होते हैं और उनके अनेक प्रकार के शब्द होते हैं। उन शब्दों को एक ही समय में अलग-अलग सुनने की शक्ति को संभिन्न-संश्रोतृ ऋद्धि कहते हैं।

फिर ग्रंथ के आदि के एक पद को ग्रहण करके सम्पूर्ण ग्रंथ को कहना, तथा मध्य के एक पद को ग्रहण करके और अंत के एक पद को ग्रहण करके सम्पूर्ण ग्रंथ को कहने की शक्ति को पदानुसार नाम की ऋद्धि कहते हैं।

संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरादास्वादन-घ्राण-विलोकनानि |

दिव्यान् मतिज्ञान-बलाद्वहंत: स्वस्तिक्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठचक्रवर्तिकै स्पर्शनइंद्रियका विषय नवजोजनका है। रसनाइंद्रिय अर घ्राण इंद्रियकाहू नवयोजनका है। चक्षुइंद्रियकासैतालीस हजार दोयसै त्रेसठयोजनका है। कर्णइंद्रियका द्वादशयोजनका है । महान पुन्यकी शक्ति का धारक चक्री कैं पांचइंद्रियनके विषयउत्कृष्ट एताही है। इस सिवाय नहीं ।  अरऋषिनिकै दिव्यमतिग्यान केवलतें जोदूर सैकडांयोजनपरै वस्तुका स्पर्शन श्रवण आस्वादन आघ्राणा अवलोकन होय सो १.दूरिस्पर्शनऋद्धि  .दूरिश्रवणऋद्धि  .दूरिआस्वादनऋद्धि ४.दूरिआघ्राणऋद्धि  .दूरिविलोकन ऋद्धि ऐसे पांच प्रकार ऋद्धिनिनै दिव्यमतिज्ञान का वलतैं धारण करै हैं ते परमऋषि हमारे कल्याण करहु।

सरलार्थ – चक्रवर्ती के स्पर्शन इन्द्रिय के विषय का क्षेत्र नौ योजन का है। रसना इन्द्रिय और घ्राण इन्द्रिय का विषय भी नौ योजन का है। चक्षु इन्द्रिय का विषय तैंतालीस हजार दो सौ तिरेसठ योजन का है। कर्ण इन्द्रिय का विषय बारह योजन का है। महान पुण्य की शक्ति को धारण करने वाले चक्रवर्ती के पाँचों इन्द्रियों के विषयों की उत्कृष्टता इतनी ही है, इससे अधिक नहीं है।

और ऋषियों को दिव्य मतिज्ञान के बल से सैकड़ों योजन दूर स्थित वस्तु का स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सूँघना और देखना होता है। ये क्रमशः १. दूरिस्पर्शन ऋद्धि, २. दूरिश्रवण ऋद्धि, ३. दूरिआस्वादन ऋद्धि, ४. दूरिआघ्राण ऋद्धि और ५. दूरिविलोकन ऋद्धि हैं। इस प्रकार पांच प्रकार की ऋद्धियों को दिव्य मतिज्ञान के बल से धारण करने वाले वे परम ऋषि हमारा कल्याण करें।

प्रज्ञा-प्रधाना: श्रमणा: समृद्धा: प्रत्येकबुद्धा: दशसर्वपूर्वै: |

प्रवादिनोऽष्टांग-निमित्त-विज्ञा: स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठप्रज्ञाहै प्रधान कहिये आदि जिनके ऐसी प्रज्ञा श्रमण ऋद्धिके धारक अर प्रत्येकबुद्धि ऋद्धि करि समृद्ध अर दशपूर्व, अरू चतुर्दशपूर्व निकरि संयुक्त अर प्रवाद ऋद्विके धारक अर अष्टांग निमित्त के जाननेवाले परम ऋषिहै तेहमारा आत्माका कल्याण करो।

सरलार्थ – जिनमें प्रज्ञा (विशेष ज्ञान) ही प्रधान है, ऐसे श्रमण, ऋद्धियों के धारक, प्रत्येकबुद्धि ऋद्धि से सम्पन्न, दस पूर्व और चौदह पूर्व के ज्ञाता, प्रवाद ऋद्धि के धारक तथा अष्टांग निमित्त के जानकार परम ऋषि हमारे आत्मा का कल्याण करें।

अर्थात इसमें महान ज्ञान और ऋद्धियों से सम्पन्न परम ऋषियों को नमन करते हुए अपने आत्मकल्याण की प्रार्थना की गई है।

भावार्थ – मूल पाठ-

१.    जो अति सूक्ष्म तत्त्व का विचार विषय श्रुतकेवलीविनां अन्य उत्तर देनेकूं समर्थनहीं। ऐसे गहन अर्थकूं द्वादशांग पढ़ा विनांही श्रुतज्ञानावरण, वीर्यांतरायका क्षयोपशमते बुद्धि में ऐसी प्रबल शक्ति प्रगट होय जाय, जो संशयरहित प्ररूपण करै॥ ते प्रज्ञाश्रमण ऋद्धिके धारक हैं॥

२.    अर जो अन्यका उपदेश विनाहीं ज्ञानका संयमका विधाननिमें निपुणपणां अपनी शक्तितें ही हो जाय, ते प्रत्येकबुद्धि ऋद्धिके धारक है॥

३.    वहुरि जो महारोहणादिक अनेक विद्या अपना-अपना सामर्थ अरु स्वरूप कहने में, प्रगट करने में प्रवीण अर महावेगवत् ऐसी विद्या देवतानि करि जिनका चरित्र चलायमान नहीं होय, ते दशापूर्व ऋद्धिके धारक हैं॥  

४.    वहुरि समस्त द्वादशांग के धारक श्रुतकेवलीते चतुर्दश पूर्वके धारक हैं॥  

५.    वहुरि अंतरीक्ष, भोम, अंग, स्वर-व्यंजन, लक्षणा, छिन्नस्वप्न नामयुक्त अष्ट प्रकारके निमित्तज्ञानतें त्रिकाल संबंधी सुख-दुःख, लाभ-अलाभ, जीवन-मरणकूं जांनेते अष्टांग निमित्त ऋद्धिके धारक हैं॥

६.    वहुरि इंद्रादिकषाय विवाद करै तो जिनका सामर्थ नहीं रुकै, इंद्रादिकनकूं निरुत्तर करिदे अर परके छिद्र जानिले, तिनके वादित्व ऋद्धि होयहै॥

ऐसे केवलज्ञान १, मनपर्ययज्ञान २, अवधिज्ञान ३, कोष्टबुद्धि ४, वीजबुद्धि ५, संभिन्नसंश्रोतृत्व ६, पादानुसार ७, दूरस्पर्शन ८, दूरश्रवण ९, दूरास्वादन १०, दूराघ्रान ११, दूराविलोकन १२, प्रज्ञाश्रवण १३, प्रत्येकबुद्धत्व १४, दसपूर्व १५, चतुर्दसपूर्व १६, प्रवादित्व १७, अष्टांग निमित्त १८, बुद्धिरिद्धिके अठारह भेद कहे हैं। ते तपके प्रभावतें उपजैहै। ऐसी बुद्धिरिद्धिके धारक परमगुरु हमारे बुद्धिकी उज्जवलता करो।

भावार्थ का सरलार्थ –

१.    अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्वों का विचार करने के विषय में, श्रुतकेवली के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति उत्तर देने में समर्थ नहीं होता। ऐसे गहन अर्थ को, द्वादशांग का अध्ययन किए बिना ही, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम के कारण जिसकी बुद्धि में ऐसी प्रबल शक्ति प्रकट हो जाती है कि वह उन विषयों का संशयरहित रूप से निरूपण कर सके, वह प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि का धारक कहलाता है॥

२.    और जो व्यक्ति किसी अन्य के उपदेश के बिना ही, अपनी शक्ति से ज्ञान और संयम के विधान में निपुण हो जाता है, वह प्रत्येकबुद्धि ऋद्धि का धारक है॥  

३.    फिर जो व्यक्ति महारोहण आदि अनेक विद्याओं के अपने-अपने सामर्थ्य और स्वरूप को कहने तथा प्रकट करने में निपुण हो और ऐसी महावेगवती विद्याओं को देवताओं के द्वारा प्राप्त करके भी जिसका चरित्र विचलित न हो, वह दशपूर्व ऋद्धि का धारक है॥  

४.    फिर जो समस्त द्वादशांग का धारक है, वह श्रुतकेवली कहलाता है और जो चतुर्दश पूर्वों का धारक है, वह चतुर्दशपूर्व ऋद्धि का धारक है॥

५.    फिर जो अन्तरीक्ष, भौम, अंग, स्वर, व्यंजन, लक्षणा और छिन्नस्वप्न आदि नाम वाले अष्ट प्रकार के निमित्त-ज्ञान के द्वारा तीनों कालों से सम्बन्धित सुख-दुःख, लाभ-अलाभ तथा जीवन-मरण आदि को जानता है, वह अष्टांग निमित्त ऋद्धि का धारक है॥  

६.    फिर जब इन्द्र आदि के साथ विवाद होता है, तब जिनकी सामर्थ्य रुकती नहीं है और जो इन्द्र आदि को निरुत्तर कर देते हैं तथा दूसरों के दोषों को जान लेते हैं, उनमें वादित्व ऋद्धि होती है॥

इस प्रकार केवलज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, अवधिज्ञान, कोष्टबुद्धि, वीजबुद्धि, संभिन्नसंश्रोतृत्व, पादानुसार, दूरस्पर्शन, दूरश्रवण, दूरास्वादन, दूराघ्राण, दूराविलोकन, प्रज्ञाश्रवण, प्रत्येकबुद्धत्व, दशपूर्व, चतुर्दशपूर्व, प्रवादित्व और अष्टांग निमित्त—ये बुद्धि-ऋद्धि के अठारह भेद कहे गए हैं। ये सभी ऋद्धियाँ तप के प्रभाव से उत्पन्न होती हैं। ऐसी बुद्धि-ऋद्धि के धारक परमगुरु हमारे बुद्धि की उज्ज्वलता करें।

अणिम्नि दक्षा: कुशला: महिम्नि, लघिम्नि शक्ता: कृतिनो गरिम्णि |

मनो-वपुर्वाग्बलिनश्च नित्यं स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठअणिमारिद्धिमें प्रवीण अर महिमा ऋद्धिमें कुशल अर लघिमा ऋद्धिमें समर्थ अर गरिमा ऋद्धि में समर्थ अर मनवल, सरीरवल, वचनवल ऋद्धिके धारक ऐसे परमऋषि है ते हमारे परम कल्याण करो।

सरलार्थ – जो अणिमा ऋद्धि में प्रवीण हैं, महिमा ऋद्धि में कुशल हैं, लघिमा ऋद्धि में समर्थ हैं तथा गरिमा ऋद्धि में भी समर्थ हैं; जो मनबल, शरीरबल और वचनबल रूपी ऋद्धियों के धारक हैं—ऐसे परम ऋषि हमारे परम कल्याण करें।

भावार्थ – मूल पाठ-

१.    जो अणुमात्र सूक्ष्म शरीर करने का सामर्थ सो अणिमा।

२.    मेरूतेहूं महान शरीरकी विक्रियाकरणां सो महिमा ऋद्धिहै।

३.    पवनहूंते अति हलका सरीरकरनां सो लघिमा ऋद्धि है।

४.    वज्रहूंते अतिभारी शरीरकरणां सो गरिमा ऋद्धि है।

ऐसे च्यारि प्रकार विक्रिया ऋद्धि तो इस काव्य में कही। अन्य विक्रियाऋद्धि अगली काव्य में कहसी॥

इहां अब तीन प्रकार बल ऋद्धि कहैं हैं।

१.    मन अरु जिव्हा श्रुतज्ञानावरण वीर्यांतरायका क्षयोपसमरूप अतिसय करि अंतर्मुहूर्त में समस्त श्रुतज्ञानके अर्थ का चिंतवन करनें में समर्थ है। ते मनो वल ऋद्धि के धार कहैं।

२.    बहुरि जो अंतमुहूर्त में समस्त श्रुतज्ञान का उच्चारण करने में सामर्थता॥ अर उच्च स्वर कर निरंतर उच्चारण कर तेहूं जिनके वेदनहोय अर कंठ नहीं बिगडै तै वचनबलऋद्धिके धारक हैं।

३.    बहुरि वीर्यांतराय का असाधारण क्षयोपसमके वलते च्यारि महीना तथा एक वरसपर्यंत अहारपानरहित प्रतिमायोग धारणा करतेहूं जिनका सरीर वेदरहित सुगंधिततेजसहिततो वे ते कायबलऋद्धिके धारक हैं।

ऐसे तीन प्रकार बलऋद्धिके धारक ऋषीस्वरते हमारे तप करने में समाधिमरण करने में परममंगलरूप होहु॥

भावार्थ का सरलार्थ –

१.    जो शरीर को अणु के समान अत्यन्त सूक्ष्म करने का सामर्थ्य है, वह अणिमा ऋद्धि है।

२.    मेरु पर्वत से भी महान् शरीर की विक्रिया करने को महिमा ऋद्धि कहते हैं।

३.    वायु से भी अधिक हल्का शरीर करने को लघिमा ऋद्धि कहते हैं।

४.    वज्र से भी अधिक भारी शरीर करने को गरिमा ऋद्धि कहते हैं।

इस प्रकार चार प्रकार की विक्रिया ऋद्धि इस काव्य में कही गई हैं। अन्य विक्रिया ऋद्धि अगले काव्य में कही जाएगी।

अब यहाँ तीन प्रकार की बल ऋद्धि कहते हैं।

१.    मन और जिह्वा, श्रुतज्ञानावरण तथा वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम रूप अतिशय के कारण, अन्तर्मुहूर्त में समस्त श्रुतज्ञान के अर्थ का चिन्तन करने में समर्थ होते हैं। ऐसे मनोबल ऋद्धि के धारक कहे जाते हैं।

२.    फिर जो अन्तर्मुहूर्त में समस्त श्रुतज्ञान का उच्चारण करने में समर्थ हों तथा ऊँचे स्वर में निरन्तर उच्चारण करने पर भी जिनको किसी प्रकार का वेदन न हो और कण्ठ खराब न हो, वे वचनबल ऋद्धि के धारक हैं।

 

३.    फिर वीर्यान्तराय कर्म के असाधारण क्षयोपशम के बल से जो चार महीने तथा एक वर्ष तक आहार-पान रहित प्रतिमायोग धारण करते हुए भी जिनका शरीर वेदरहित, सुगन्धित और तेजसहित रहता है, वे कायबल ऋद्धि के धारक हैं।

इस प्रकार इन तीन प्रकार की बल ऋद्धि के धारक ऋषीश्वरों से हमारे तप करने और समाधिमरण करने में परम मंगल हो।

सकामरूपित्व-वशित्वमैश्यं प्राकाम्यमन्तर्द्धिमथाप्तिमाप्ता: |

तथाऽप्रतीघातगुणप्रधाना: स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठच्यारि प्रकार विक्रियाऋद्धि पहले काव्य में कही, अब और विक्रियाऋद्धि कहे है—

१.    काम्यरूपत्वऋद्धि

२.    वशित्वऋद्धि

३.    ऐस्यऋद्धि

४.    प्रकाम ऋद्धि

५.    अंतर्द्धि ऋद्धि

६.    प्राप्तऋद्धि

७.    तथा अप्रतिघातगुणा

प्राप्तभये है प्रधान जिनके ते महाऋषि हमारे कल्यान करहु।

१. युगपत् अनेक आकार अनेक रूप विक्रिया करनेकूं समर्थ ते कामरूपित्वऋद्धिके धारक हैं॥

२. बहुरि समस्त जीवनकूं वसि करने का सामर्थ ते वशित्वऋद्धिके धारक हैं॥

३. बहुरि त्रैलोक्य की प्रभुता धारण करने का सामर्थ सो ऐश्वर्य ऋद्धि के धारक है॥

४. जलमें भूमिवत् गमन करना भूमिमें जलवत् उन्मज्जन निमज्जन करनेका सामर्थ्य ते प्राकाम्य ऋद्धिके धारकहैं॥

५. अदृश्यरूप शक्तिकूं धारते अंतर्द्धीन ऋद्धिके धारकहैं॥

६. भूमिमें तिष्ठतेही अंगुलि पसारि मेरुका सिखरकूं स्पर्श सूर्यचंद्रमादिकनकूं स्पर्शन करिले ते आप्त ऋद्धिके धारकहैं॥

७. बहुरि पर्वतमें वज्रादिकनिमें आकासकी ज्यौं गमन करने में समर्थ ते अप्रतीघात ऋद्धिके धारकहैं॥

ऐसे ग्यारह प्रकार विक्रियाऋद्धि के धारक परमऋषि हमारे हृदयके रागद्वेषादि विकार दूर करे॥

सरलार्थ – चार प्रकार की विक्रिया ऋद्धि पहले श्लोक में कही गई है, अब अन्य विक्रिया ऋद्धियों को कहते हैं—

१. काम्यरूपत्व ऋद्धि

२. वशित्व ऋद्धि

३. ऐश्वर्य ऋद्धि

४. प्राकाम्य ऋद्धि

५. अंतर्धान ऋद्धि

६. प्राप्ति ऋद्धि

७. तथा अप्रतिघात ऋद्धि

जिन महर्षियों को ये प्रधान गुण प्राप्त हुए हैं, वे हमारा कल्याण करें।

१. एक साथ अनेक आकार और अनेक रूपों में परिवर्तन करने में जो समर्थ हैं, वे कामरूपित्व ऋद्धि के धारक हैं।

२. तथा समस्त जीवों को वश में करने का सामर्थ्य रखने वाले वशित्व ऋद्धि के धारक हैं।

३. तथा तीनों लोकों की प्रभुता धारण करने का सामर्थ्य रखने वाले ऐश्वर्य ऋद्धि के धारक हैं।

४. जल पर भूमि के समान चलना और भूमि में जल के समान डूबना-उतराना करने का सामर्थ्य रखने वाले प्राकाम्य ऋद्धि के धारक हैं।

५. अदृश्य होने की शक्ति धारण करने वाले अंतर्धान ऋद्धि के धारक हैं।

६. भूमि पर रहते हुए ही उँगली फैलाकर सुमेरु पर्वत के शिखर को छू लेना और सूर्य-चंद्रमा आदि का स्पर्श कर लेना—वे प्राप्ति ऋद्धि के धारक हैं।

७. तथा पर्वत और वज्र आदि में आकाश के समान आर-पार जाने में समर्थ महर्षि अप्रतिघात ऋद्धि के धारक हैं।

ऐसे ग्यारह प्रकार की विक्रिया ऋद्धि के धारक परम ऋषि हमारे हृदय के राग-द्वेष आदि विकारों को दूर करें।

जंघाऽनल-श्रेणि-फलांबु-तंतु-प्रसून-बीजांकुर-चारणाह्वा: |

नभोऽगंण-स्वैरविहारिणश्च स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठभूमित च्यारि अंगुल अंतरालै आकाश मैं जंघाकूं सीघ्र उठावता मे लता सैकरां योजन शीघ्र गमन करें ते जंघा चारण ऋद्धिके धारक हैं।

बहुरि आकाशकी श्रेणीमें गमन करे तथा फलनि ऊपर जल ऊपरि तथा तंतु ऊपर बीजन ऊपर अंकुरन ऊपर गमन करै तिनते जीवनिके बाधा नहीं होय॥ तंतु अंकूरादिक टूटें नहीं। और हू अग्नि शिखादिक ऊपरि गमन की सामर्थ के धारक अनेक प्रकार चारणऋद्धिके धारक हैं। बहुरि पर्यकासन तिष्ठते वा कायोत्सर्ग धारें चरणनिके उठावने मेलेने विनां आकाशमें बहुत योजन गमन करने में समर्थते आकाशगामी ऋद्धिके धारक परमऋषि हमारा कल्याण करो॥

सरलार्थ – जिन मुनियों में चारण ऋद्धि होती है, वे भूमि से चार अंगुल ऊपर अपने पैरों को उठाकर आकाश में बहुत तेजी से गमन कर सकते हैं। वे एक ही क्षण में सैकड़ों योजन की दूरी तय करने में समर्थ होते हैं।

वे आकाश में बनी हुई विभिन्न श्रेणियों में भी चल सकते हैं। फल, जल, तंतु, बीज और अंकुर आदि के ऊपर से भी वे गमन कर सकते हैं, लेकिन उनके चलने से उन जीवों को कोई बाधा नहीं होती और न ही तंतु, बीज, अंकुर आदि टूटते हैं।

कुछ चारण ऋद्धि वाले मुनियों में अग्नि की ज्वाला आदि के ऊपर से भी चलने की सामर्थ्य होती है। इस प्रकार चारण ऋद्धि अनेक प्रकार की होती है।

इसके अतिरिक्त, जो परम ऋषि पर्यंकासन में बैठे हुए या कायोत्सर्ग में स्थित होकर, पैरों को उठाने या रखने की आवश्यकता के बिना ही आकाश में अनेक योजन तक गमन करने में समर्थ होते हैं, उन्हें आकाशगामी ऋद्धि का धारक कहा जाता है।

ऐसे चारण ऋद्धि और आकाशगामी ऋद्धि से संपन्न परम ऋषि हमारा कल्याण करें।

दीप्तं च तप्तं च महोग्रं घोरं तपो घोरपराक्रमस्था: |

ब्रह्मापरं घोरगुणंचरन्त: स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठ

१. दीप्त तप ऋद्धि

२. तप्ततप ऋद्धि

३. महातप ऋद्धि

४. उग्रतप ऋद्धि

५. घोरतप ऋद्धि

६. घोर पराक्रम ऋद्धि

७. घोर ब्रह्मचर्य ऋद्धि

ऐसे सप्तप्रकार तप ऋद्धि के धारक परम ऋषि हम जै है तिनके कल्याण करो।

१.    एक उपवास तथा दोय, तीन, च्यारि, पांच तथा पक्ष मासादिकने अनसन होतेहूं काय, मन, वचन का बल वधता चला जाय। सरीर दुर्गंध रहित हो जाय कमलादिकवत् सुगंध स्वास हो जाय सरीरकी महादीप कांति प्रगट हो जाय ते दीप्ततप ऋद्धि के धारक है।

२.    बहुरि जिनके भक्षण किया हूवा अल्प आहार जल है सो तप्त लोह के कडाह में पड़ा जल का कण की ज्यों शुष्क हो जाय मल मूत्र रुधिर मांसादिक रूप परिणमन न होय सो तप्ततप ऋद्धि के धारक हैं।

३.    बहुरि जो सिंहनिः कीडितादि उपवासादिक आचरण करने में तत्पर ते महातप ऋद्धि के धारक हैं।

४.    बहुरि जे एक उपवास दोय, तीन उपवास वा पक्षोपवास मासोपवासादिकनिमें कोऊ एक का आरंभ होय गया होय ताते मरणपर्यंत उलटा नहीं वाहुडे ते उग्रतप ऋद्धिके धारक हैं।

५.    बहुरि जे वात पित्त कफ सन्निपातादिक तें उपजै ज्वरकास स्वास उदरसूल नेत्रसूल पार्श्वसूल मस्तक सूलादिक तथा कोऊ प्रमेहादिक नाना प्रकार के रोगनिकरि जिन का देह संतापित है तोहू अनसन कायक्लेशादिक तपकूं नाही छोड़ै है अर भयानक वन समान पर्वतनिके सिखर गुफा दराडा शून्य ग्रामादिक जिनमें दुष्ट राक्षस भूत पिशाच तथा भील सिकारी विचरैं॥ तथा जहां सिंह व्याघ्रादिक दुष्ट जीवनिके भयंकर सब्द प्रवर्ते तिन स्थान में जिनकूं निवास रुचैते घोरतप ऋद्धिके धारकहैं।

६.    बहुरि जे अनेक रोगादिक होते हुए एकांत भयानक स्थाननिमें नित्य तप की वृद्धि करै ते घोर पराक्रम ऋद्धि के धारक हैं।

७.    चिरकाल के ब्रह्मचर्य को धारते जिनकूं देवताहू स्वप्नहूमें चलायमान नहीं कर सकै ते घोर ब्रह्मचर्य ऋद्धि के धारक हैं।

     ऐसे तप ऋद्धिके धारक परमऋषि हमारे विषय कषायनिका निग्रह करो।

 

सरलार्थ –

१. दीप्ततप ऋद्धि

२. तप्ततप ऋद्धि

३. महातप ऋद्धि

४. उग्रतप ऋद्धि

५. घोरतप ऋद्धि

६. घोर पराक्रम ऋद्धि

७. घोर ब्रह्मचर्य ऋद्धि

ऐसे सात प्रकार की तप ऋद्धि को धारण करने वाले परम ऋषि जो हम जैसे हैं, उनका कल्याण करें।

१. एक उपवास अथवा दो, तीन, चार, पाँच तथा पक्ष, महीने आदि के उपवास (अनशन) होते हुए भी जिनके शरीर, मन और वचन का बल बढ़ता चला जाए; जिनका शरीर दुर्गंध रहित हो जाए; जिनकी श्वास कमल आदि के समान सुगंधित हो जाए; और जिनके शरीर में अत्यधिक दिव्य कांति प्रकट हो जाए, वे दीप्ततप ऋद्धि के धारक हैं।

२. इसके अतिरिक्त, जिनके द्वारा ग्रहण किया गया अल्प आहार और जल गर्म लोहे के कड़ाहे में पड़े जल के कण की तरह सूख जाए, तथा वह मल, मूत्र, रक्त, माँस आदि रूप में परिणत न हो, वे तप्ततप ऋद्धि के धारक हैं।

३. इसके अतिरिक्त, जो सिंहनिष्क्रीड़ित आदि उपवासों का आचरण करने में तत्पर रहते हैं, वे महातप ऋद्धि के धारक हैं।

४. इसके अतिरिक्त, जिन्होंने एक उपवास, दो-तीन उपवास अथवा पक्षोपवास, मासोपवास आदि में से किसी एक को प्रारंभ कर दिया हो और उससे मरणपर्यंत पीछे न हटें (नियम का पालन करें), वे उग्रतप ऋद्धि के धारक हैं।

५. इसके अतिरिक्त, जो वात, पित्त, कफ, सन्निपात आदि से उत्पन्न होने वाले ज्वर, खाँसी, श्वास, पेट का दर्द, आँखों का दर्द, पसलियों का दर्द, सिरदर्द आदि तथा प्रमेह (मधुमेह) आदि अनेक प्रकार के रोगों से शरीर के पीड़ित होने पर भी अनशन, कायक्लेश आदि तप को नहीं छोड़ते हैं; तथा भयानक वन, पर्वतों के शिखर, गुफाएं, दर्रे  (प्राकृतिक संकरे रास्ते), उजाड़ गाँव आदि—जहाँ दुष्ट राक्षस, भूत, पिशाच और भील-शिकारी घूमते हों, एवं जहाँ सिंह, बाघ आदि हिंसक जीवों की भयानक आवाजें आती हों—ऐसे स्थानों में जिन्हें निवास करना रुचता हो, वे घोरतप ऋद्धि के धारक हैं।

६. इसके अतिरिक्त, जो अनेक प्रकार के रोग आदि होते हुए भी एकांत और भयानक स्थानों में निरंतर तप की वृद्धि करते हैं, वे घोर पराक्रम ऋद्धि के धारक हैं।

७. लंबे समय से ब्रह्मचर्य धारण करने वाले, जिन्हें देव भी स्वप्न में भी विचलित नहीं कर सकते, वे घोर ब्रह्मचर्य ऋद्धि के धारक हैं।

ऐसे तप ऋद्धि को धारण करने वाले परम ऋषि हमारे विषय-कषायों का नाश (दमन) करें।

आमर्ष-सर्वोषधयस्तथाशीर्विषंविषा – दृष्टिविषंविषाश्च

सखिल्ल-विड्जल्ल-मलौषधीशा: स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठ

१. जिनका हस्तपादादिक अंगनिका स्पर्शही समस्त असाध्य रोगनिकूं दूरिकरै ते आमर्श ऋद्धिके धारक हैं ॥

२. जिनका अंग प्रत्यंग नख केशादिकनिकूं स्पर्श करि पवन आवै सो ही समस्त रोगनिकूं नष्ट करै ते सर्वौषधि ऋद्धिके धारक हैं।

३. उत्कृष्ट विषकरि व्याप्तहू भोजन जिनका मुखमें प्राप्त होय विषरहित हो जाय अथवा जिनके मुखतें निकसै वचनकूं श्रवण करिनै करि महाविषकर व्याप्तहू पुरुष निर्विष हो जाय तो आस्यविषऋद्धिके धारक हैं। बहुरि जिनके देखनि मात्र करिके ही प्रतितीव्र विषकर दूषित प्राणी भी तत्काल निर्विष होय जाय। ते दृष्टिविषके धारक हैं। मुखमें प्राप्त भया विषके नष्ट करनेकूं विषसमान ताते आसीविष नाम कहा है।

४. अर दृष्टिगोचर भया विष ताहि नष्ट करनेकूं विषसमान ताते दृष्टिविषंविषा ऐसा विशेषण कीया है।

५. बहुरि जिनका नख थूक कफादिक का स्पर्श्य पवनते रोग विनस जाय ते खेलोधधि ऋद्धि के धारक है।

६. जिनका मलादिकनिका स्पर्श्या पवनते नष्ट होय जाय ते विडौषधिऋद्धिके धारक हैं।

७. जिनका पसेवका स्पर्शन कीया पवनतें रोग नष्ट हो य ते जलौषधि ऋद्धिके धारक हैं।

८. जिनका करण दंत नासिका नेत्रादिकतें उपज्या मलका स्पर्शने वाला पवन करि असाध्य रोग नष्ट हो जाय ते मलौषधि ऋद्धिके धारक हैं।

ऐसे अष्ट प्रकार औषधि ऋद्धिके धारक परमऋषि हमकूं समस्त रोग रहित करो।

सरलार्थ –

१. आमर्शौषधि ऋद्धि (आमर्श ऋद्धि):

जिन मुनिराजों के हाथ, पैर आदि अंगों के मात्र स्पर्श से ही सामने वाले के सभी असाध्य (न ठीक होने वाले) रोग दूर हो जाते हैं, वे 'आमर्शौषधि ऋद्धि' के धारक होते हैं।

२. सर्वौषधि ऋद्धि:

जिन मुनिराजों के अंग-प्रत्यंग, नाखून, बाल आदि को छूकर आने वाली पवन (हवा) ही जीवों के समस्त रोगों को नष्ट कर देती है, वे 'सर्वौषधि ऋद्धि' के धारक होते हैं।

३. आस्यविष (आशीविष) ऋद्धि एवं दृष्टिविष ऋद्धि:

 * आस्यविष (आशीविष) ऋद्धि: यदि अत्यंत तीव्र विष से युक्त भोजन भी जिनके मुख में जाए तो वह विष-रहित (अमृत समान) हो जाए, अथवा जिनके मुख से निकले वचनों को सुनने मात्र से ही भयंकर विष से पीड़ित व्यक्ति पूरी तरह विष-रहित (रोगमुक्त) हो जाए, वे 'आस्यविष ऋद्धि' के धारक होते हैं।

 * दृष्टिविष ऋद्धि: जिनके केवल देखने मात्र से ही अत्यंत तीव्र विष से प्रभावित प्राणी तत्काल विष-रहित और स्वस्थ हो जाए, वे 'दृष्टिविष ऋद्धि' के धारक होते हैं।

   (मुँह में पहुँचे विष को समाप्त करने की शक्ति रखने के कारण इसे 'आस्यविष' और दृष्टि मात्र से विष समाप्त करने के कारण 'दृष्टिविष' कहा गया है।)

४. दृष्टिविष का विशेषण:

जो विष दृष्टिगोचर हुआ हो (दिखाई दे रहा हो) और उसे मात्र अपनी दृष्टि से ही नष्ट करने में विष के समान तीव्र प्रभावकारी हों, इसी कारण उन्हें 'दृष्टिविष' विशेषण दिया गया है।

५. खेलौषधि ऋद्धि:

जिनके थूक, कफ या मुख-लार आदि को छूकर आने वाली वायु (पवन) के प्रभाव से ही जीवों के रोग नष्ट हो जाते हैं, वे 'खेलौषधि ऋद्धि' के धारक होते हैं। (यहाँ पाठ में नख का उल्लेख संकेत रूप में है, 'खेल' का मूल अर्थ कफ/थूक होता है)।

६. विडौषधि ऋद्धि:

जिनके मल (विष्ठा) आदि के संपर्क में आई हुई पवन के स्पर्श मात्र से ही रोगियों के रोग दूर हो जाते हैं, वे 'विडौषधि ऋद्धि' के धारक होते हैं।

७. जल्लौषधि (जलौषधि) ऋद्धि:

जिनके पसीने को छूकर बहने वाली हवा से ही जीवों के रोग समाप्त हो जाते हैं, वे 'जल्लौषधि ऋद्धि' के धारक होते हैं।

८. मलौषधि ऋद्धि:

जिनके कान, दाँत, नाक, आँख आदि से निकले हुए मैल को छूकर आने वाली पवन से ही कठिन से कठिन असाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं, वे 'मलौषधि ऋद्धि' के धारक होते हैं।

भावार्थ :

ऐसे आठों प्रकार की 'औषधि ऋद्धि' से संपन्न परम पूज्य मुनिराज/महर्षि हमें (समस्त जीवों को) सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्त करें।

क्षीरं स्रवंतोऽत्र घृतं स्रवंत: मधु स्रवंतोऽप्यमृतं स्रवंत: |

अक्षीणसंवास-महानसाश्च स्वस्ति-क्रियासु: परमर्षयो न: ||

मूल पाठ

१. क्षीरादिक रसरहितहू भोजन जिनका हस्तमें प्राप्त हूवो क्षीरादिरस रूप परिणामने ते प्राप्ति होय, ते क्षीरास्रावी ऋद्धि के धारक हैं।

२. घृतस्रावी ऋद्धि के धारक हैं।

३. मध्वास्रावी ऋद्धि के धारक हैं।

४. अमृतस्रावी ऋद्धि के धारक हैं।

अथवा क्षीणप्राणी जिनका वचन श्रवण करनेते खीरसका भोजन ज्यौं तृप्त तथा देवतानिका अमृत पान करि ज्यौं पुष्ट हो जाय, रोग जरादि रहित हो जाय, ते चारि प्रकार रसऋद्धिके धारक हैं।

क्षेत्र-ऋद्धि (दो प्रकार):

१. बहुरि लाभांतराय कर्म के क्षयोपसमकी अधिक्यता के धारक यती जिस थान मे जाय बसै है, तहां समस्तहू देव, मनुष्य, तिर्यंच परस्पर बाधारहित सुख सूं तिष्ठै, ते अक्षीणमहालय नाम ऋद्धि के धारक हैं।

२. बहुरि लाभांतरायका क्षयोपसमकी अधिक्यता के धारक यतीनकूं जिस पात्रमें भोजन दीजिये, तिस पात्र में तें जो चक्रवर्ती की सेनाहू भोजन करिले, तो हू तिस दिन विषैं भाजन में भोजन का अभाव नहीं होय, अटूट हो जाय—ऐसे दोय प्रकार क्षेत्र ऋद्धि कहा।

प्रशस्ति / उपसंहार:

वीतरागीनके तपका अचिंत्य प्रभाव है, वचनके अगोचर प्रभाव है, इहां वह पुरुष धन्य है जे ऐसे योगीन का ध्यान स्तवन करे है।

ऐसे दस काव्यनिमें स्वस्ति मंगल स्तवन कीया॥

सरलार्थ –

रस-ऋद्धि (चार प्रकार):

१. क्षीरस्रावी ऋद्धि: सूखा या नीरस (रस-रहित) भोजन भी जिन मुनिराजों के हाथ में आते ही दूध (खीर) जैसे सरस और मधुर रूप में बदल जाता है, वे 'क्षीरस्रावी ऋद्धि' के धारक होते हैं।

२. घृतस्रावी ऋद्धि: जिनके हाथ में आते ही भोजन घी (घृत) के समान सरस और चिकनाई युक्त हो जाता है, वे 'घृतस्रावी ऋद्धि' के धारक होते हैं।

३. मध्वास्रावी ऋद्धि: जिनके हाथ में आते ही भोजन शहद (मधु) के समान मीठा और स्वादिष्ट बन जाता है, वे 'मध्वास्रावी ऋद्धि' के धारक होते हैं।

४. अमृतस्रावी ऋद्धि: जिनके हाथ में आते ही साधारण भोजन भी अमृत के समान गुणकारी और पुष्टिकारक हो जाता है, वे 'अमृतस्रावी ऋद्धि' के धारक होते हैं।

अथवा दूसरा अर्थ:

कमजोर, दुखी या शक्तिहीन प्राणी जिनके वचनों को सुनने मात्र से ही खीर के भोजन की तरह तृप्त हो जाएँ, देवताओं के अमृत-पान की तरह पुष्ट और बलवान बन जाएँ तथा रोग एवं बुढ़ापे के कष्टों से मुक्त हो जाएँ—वे मुनिराज इन चार प्रकार की रस-ऋद्धियों के धारक कहलाते हैं।

क्षेत्र-ऋद्धि (दो प्रकार):

१. अक्षीणमहालय ऋद्धि: लाभांतराय कर्म के विशेष क्षयोपशम (अत्यधिक कमी) से युक्त मुनिराज जिस स्थान पर जाकर ठहरते हैं, उस छोटे स्थान में भी सभी देव, मनुष्य और तिर्यंच (पशु-पक्षी) बिना किसी बाधा या संकोच के एक साथ सुखपूर्वक समा जाते हैं और बैठ जाते हैं; वे 'अक्षीणमहालय ऋद्धि' के धारक होते हैं।

२. अक्षीणमहानस ऋद्धि: लाभांतराय कर्म के विशेष क्षयोपशम के धारक मुनिराज को जिस पात्र (बर्तन) में आहार दिया जाए, उस पात्र से यदि चक्रवर्ती की विशाल सेना भी भोजन कर ले, तब भी उस दिन उस बर्तन में भोजन की कभी कमी नहीं होती—भोजन अटूट बना रहता है।

ये दो प्रकार की 'क्षेत्र-ऋद्धियाँ' कही गई हैं।

प्रशस्ति / उपसंहार:

वीतरागी संतों के तप का प्रभाव अकल्पनीय (जिसकी कल्पना न की जा सके) और वाणी के सामर्थ्य से भी परे (अगोचर) है। संसार में वह मनुष्य सचमुच धन्य है जो ऐसे परम योगियों का ध्यान और गुणगान करता है।

इस प्रकार इन दस पद्यों (श्लोकों) में मंगलकारी स्तुति की गई है।

 

                  

नित्य नियम पूजा पीठिका की वचनिका

  पं. सदासुखदास जी कासलीवाल कृत नित्य नियम पूजा पीठिका की वचनिका ॐ नमः सिद्धेभ्य: मूल पाठ -  अथ नित्य नियम पूजन की वचनिका लिख्यते।...