श्रुतपंचमी महापर्व
इस कलिकाल में (ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी) इस दिन जैनधर्म के प्रथम ग्रन्थ षट्खंडागमजी की रचना पूर्ण हुई थी। इसलिए यह जैनधर्म का एक महापर्व माना जाता है। इसे जैनधर्म के श्रद्धालु बहुत प्रकार से मनाते है। बहुत से नगरों में जिनमंदिर में जिनवाणी पूजन तथा श्रुतपंचमी विधान किया जाता है, विद्वानों के प्रवचन तथा गोष्ठी के माध्यम से जिनवाणी व इस पर्व का माहात्म्य समाज को समझाया जाता है। तथा नगरों में मां जिनवाणी के सम्मान में जिनवाणी को मस्तक पर धारण करके जुलूस इत्यादि भी निकाले जाते है। किन्तु मैं इस विषय में कुछ और कहना चाहता हूं। आखिर श्रुतपंचमी क्या है? वह श्रुत (जिनवाणी) हमारे पास तक कैसे पहुंची है? हमारे जीवन में इसका क्या महत्व है? इसे कैसे मनाना चाहिए? इसका सत्य स्वरूप समझना बहुत आवश्यक है। वास्तव में श्रुतपंचमी महापर्व समाज के कल्याण के लिए भावलिंगी दिगम्बर मुनिराजों का बलिदान है, उनका अनन्त पुरुषार्थ है, उनकी देह का रक्त है, जिसके हर शब्द में उनकी पीड़ा भी है। तीर्थंकर भगवान महावीर की दिव्यध्वनि में जो द्वादशांग का वर्णन आया। उसका असंख्यातवां भाग गणधरदेव ग्रहण कर पाते है,...