भगवान महावीर और उनकी आचार्य परम्परा: एक काव्य:-
(दोहा) हुए हो रहे होएंगे , वीतराग मुनिराज। नमूं सभी को मैं सदा, मन-वच-काय सम्हाल।। (वीरछंद) भरतक्षेत्र के आर्यखंड के, तीर्थंकर चौबीस नमन। अन्तिम वर्धमान स्वामी के, चरणों में शत-शत वंदन।। अनुबद्ध तीन केवली नमूं, गौतम, सुधर्म, जम्बूस्वामी। इनके बाद हुए पांच, श्रुतकेवली द्वादशांग ज्ञानी।। विष्णु, नन्दिमित्र, अपराजित, गोवर्द्धन, भद्रबाहु है नाम। पांचों श्रुतकेवली मुनिवर के, चरणों में शत-शत प्रणाम।। इनके बाद हुए ग्यारह, अंग दस पूर्वों के ज्ञानी। विशाख, प्रौष्ठिल, क्षत्रिय, जयसेन, नागसेन स्वामी।। सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजयमुनि, बुद्धिल अरू गंगदेव स्वामी। धर्मसेन सहित ग्यारह मुनि के चरणों में शिरनामि।। ग्यारह अंगों के धारी फिर पांच हुए मुनिराज महान। नक्षत्र मुनि, जयपाल, पांडु, ध्रुवसेन कंस को करूं प्रणाम।। एक अंग के धारी चारों, मुनिराजों को करूं प्रणाम। सुभद्र, यशोभद्र, भद्रबाहु, लोहाचार्य है उनके नाम।। एक अंग के पूर्ण ज्ञानी, फिर नहीं हुए मुनिराज महान। और अंग के एक देश ज्ञाता मुनि है, तिनके कछु नाम।। अर्हद्बलि अरु माघनंदि, गुणधर अरु धरसेन महान। पुष्पदंत और भूतबली ने, षट्खंडागम लिखा ...