Tuesday, February 1, 2022

पूजा पीठिका (अर्थ सहित) :-

 संकलित:                                    

                                                    


                               पूजा पीठिका                                 

ॐ जय जय जय! नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु

अर्थ - ॐ = अरिहंत -अ +सिद्ध भगवान् के अशरीरी -अ+आचार्य (अ)=आ + उपाध्याय (उ) +साधू (मुनि) (म) अर्थात् पञ्च परमेष्ठी की जय हो जय हो जयहो, नमस्कार हो , नमस्कार हो , नमस्कार हो !

जय और नमस्कार तीन बार, मन वचन काय से करते है !

णमो अरिहंताणंणमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं,

णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं !

अर्थ-

णमो अरिहंताणं- अरिहंतो को नमस्कार हो !

णमो सिद्धाणं- सिद्धों को नमस्कार हो !

णमो आयरियाणं- आचार्यों को नमस्कार हो !

णमो उवज्झायाणं- उपाध्यायों को नमस्कार हो !

णमो लोए सव्व साहूणं- लोक के सब (निर्ग्रन्थ जैन दिगंबर) साधु को नमस्कार हो!

ॐ ह्रीं अनादिमूलमंत्रेभ्यो नम: पुष्पांजलि क्षिपेत्!

अर्थ- इस अनादि मूल मंत्र को हम नमस्कार करता हूं, पुष्प (पीले चावल) समर्पित करता हूं!

चत्तारि मंगलं पाठ

चत्तारि मंगलं, अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, 

साहू मंगलं, केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगलं !

अर्थ - जगत में चार मंगल है- अरिहंत भगवान् मंगल है, सिद्ध भगवान् मंगल है, (निर्ग्रन्थ जैन दिगंबर) साधू परमेष्ठी मंगल है और केवलि भगवान् द्वारा बताया गया वीतराग धर्म मंगल है !

मंगल - जो मोह-राग-द्वेष रूपी पापों को गलावे और सच्चा सुख उत्पन्न करे उसे मंगल कहते है। अर्हंतादिक स्वयं मंगलमय है और उनमें भक्तिभाव होने से परम मंगल होता है !

चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, 

साहू लोगुत्तमा, केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो!

अर्थ- लोक में चार उत्तम/सर्वश्रेष्ठ है- अरिहंत भगवान् लोक में उत्तम है, सिद्ध भगवान् लोक में उत्तम है, (निर्गरंथ दिगंबर जैन) साधु परमेष्ठी लोक में उत्तम है, केवलि भगवान् की दिव्य ध्वनि द्वारा बताया गया वीतराग धर्म लोक में उत्तम है !

चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहन्ते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, 

साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि!

अर्थ- मैं चारो की शरण में जाता हूं, अरिहंत भगवान् की शरण में जाता हूं, सिद्ध भगवान् की शरण में जाता हूं , (निर्ग्रन्थ दिगंबर जैन ) साधू परमेष्ठी की शरण में जाता हूं, केवलि भगवान् द्वारा कहे गये वीतराग धर्म की में जाता हूं!

ॐ नमोऽर्हंते स्वहा ! (पुष्पांजलि क्षिपेत्)

                    अर्थ- मै अरिहंत भगवान् को पुष्प (पीले चावल) समर्पित करता हूं!

मंगल विधान

अपवित्र: पवित्रो वा सुस्थितो दु:स्थिोऽपि वा !

हो येत्पंच-नमस्कारं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१॥

अर्थ-  कोई  अपवित्र, हो या  पवित्र, अच्छी  स्थिति  में  हो या बुरी स्थिति में हो, पञ्च नमस्कार मंत्र का ध्यान करने से, वह समस्त पापों से छूट जाता है !

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वास्थां गतोऽपि वा

यः स्मरेत् परमात्मानं बाह्याभ्यंतरे शुचि: ॥२॥

अर्थ- जो अपवित्र अथवा पवित्र हो, अथवा गतिमान हो ,सभी अवस्था को प्राप्त हुआ /णमोकार मंत्र /पञ्च परमेष्ठियों का स्मरण करता, बाह्य और अंतरंग से पवित्र हो जाता है !

अपराजित-मंत्रोऽयं -सर्व-विघ्न-विनाशनः

मंगलेषु सर्वेषु प्रथमं मंगलं मतः

अर्थ- यह(णमोकार मंत्र) किसी से हारने वाला नहीं है,समस्त विघ्नों को नष्ट करने वाला है और समस्त मंगलों में प्रथम मंगल है, अर्थात् समस्त मंगलकारी मंत्रो में प्रथम णमोकार मंत्र है!

एसो पञ्च णमो यारो सव्व-पावप्पणा-सणो !

मंगलाणं सव्वेसिं पढ़मं होइ मंगलं !!

अर्थ- यह पञ्च नमस्कार मंत्र समस्त पापों का नाश करने वाला है और समस्त मंगलों में पहिला मंगल है!

अर्हं-मित्य-क्षरं ब्रह्म:-वाचकं परमेष्ठिनः।

सिद्ध-चक्रस्य सद्बीजं सर्वतःप्रणमाम्यहम्

अर्थ- अर्हं,यह बीजाक्षर, अर्हंत परमेष्ठी की आत्मा को बताने वाला है अर्थात अर्हन्त परमेष्ठी का वाचक है!यह सिद्ध परमेष्ठी के समूह का श्रेष्ठ मूल बीजाक्षर है (सिद्ध यंत्र के मध्य में लिखा जाता है) मै सब प्रकार(मन, वचन, कायकृतकारितअनुमोदना) से इस 'अर्हं' बीजाक्षर को मैं प्रणाम करता हूँ !

सिद्ध भगवान् की वंदना-

कर्माष्टक विर्निमुक्तं,मोक्ष लक्ष्मी-निकेतनं।

सम्यक्तवादि-गुणोपेतं-सिद्धचक्रं नमाम्यहम्॥

अर्थ-जो अष्ट कर्मों से रहित हो गए हैऔर मोक्ष लक्ष्मी जिनका निवास है (मोक्ष लक्ष्मी सहित हो गए है), सिद्धालय में विराजमान हैसम्यक्त्वादि आठ गुणों सहित हैऐसे सिद्धों के समूह को मैं नमस्कार करता हूँ !

विघ्नौघाः प्रलयं- यान्ति, शाकिनी- भूत-पन्नगाः

विषं निर्विषतां याति, स्तूयमाने,जिनेश्वरे ॥७॥

अर्थजिनेन्द्र भगवान् का स्तवन करने से विघ्नों का समूह नष्ट हो जाते हैडाकिनी ,भूत और सर्प का भय भी समाप्त हो जाता हैविष निर्विषत्व (अमृत्व ) को प्राप्त हो जाता है !

                                   पुष्पांजलि क्षिपेत् !

पुष्प (पीले चावल)अर्पित करता हूँ !

पंचपरमेष्ठी का अर्घ्य

उदक-चंदन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्घ्यकैः |

धवल-मंगल-गान-रवाकुले जिनगृहे जिननाथमहं यजे ||

अर्थ - मैं उज्जवल मंगल गीतो के द्वारा पंचपरमेष्ठी तथा समस्त जिनालयों की वंदना करते हुए जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल तथा सम्पूर्ण अर्घ्य समर्पित करता हूं।

ह्रीं श्री अर्हंत-सिद्धाचार्योपाध्याय-सर्वसाधुभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||

अर्थ - मैं अर्हंत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-साधु इन पांचों परमेष्ठी के चरणों में अर्घ्य समर्पित करता हूं!


पूजा प्रतिज्ञा पाठ

श्रीमज्जिनेन्द्रमभिवंद्य जगत्त्रयेशम् |

स्याद्वाद-नायक-मनंत-चतुष्टयार्हम् ||

श्रीमूलसंघ-सुदृशां सुकृतैकहेतुर |

जैनेन्द्र-यज्ञ-विधिरेष मयाऽभ्यधायि |1|

अर्थमैं तीनों लोकों के स्वामियों द्वारा वन्दित, स्याद्वाद के प्रणेता, अनंत चतुष्टय   (अनंत  दर्शन,   अनंत ज्ञान,   अनंत सुख, अनंत वीर्य) युक्त जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार करके मूलसंघ (आचार्य श्री कुन्द कुन्द स्वामी की परम्परा) के   अनुसार सम्यक् दृष्टि जीवों के लिए कल्याणकारी जिन पूजा की विधि आरम्भ करता हूँ|1|

स्वस्ति त्रिलोक-गुरवे जिन-पुंगवाय |

स्वस्ति स्वभाव-महिमोदय-सुस्थिताय ||

स्वस्ति प्रकाश-सहजोर्ज्जितं दृगंमयाय |

स्वस्ति प्रसन्न-ललिताद् भुत-वैभवाय |2|

अर्थ - तीन   लोक   के   गुरु    जिन    भगवान   (के स्मरण)   के  लिए स्वस्ति (पुष्प    अर्पण) |    स्वभाव      (अन्तत      चतुष्टय)     में    सुस्थित    महामहिम (के स्मरण) के   लिये स्वस्ति   (पुष्प   अर्पण) | सम्यक दर्शन-ज्ञान, चारित्रमय (जिन भगवान के स्मरण) के   लिये   स्वस्ति   (पुष्प अर्पण) | प्रसन्न, ललित एवं समवशरण    रुप  अदभुत्  वैभव   धारी (के स्मरणके लिये स्वस्ति (पुष्प अर्पण) |2|

स्वस्त्युच्छलद्विमल-बोध-सुधा-प्लवाय |

स्वस्ति स्वभाव-परभाव-विभासकाय ||

स्वस्ति त्रिलोक-विततैक-चिदुद्गमाय |

स्वस्ति त्रिकाल-सकलायत-विस्तृताय |3|

अर्थ - सतत्   तरंगित    निर्मल   केवल ज्ञान अमृत प्रवाहक (के स्मरण) के  लिये स्वस्ति   (पुष्प   अर्पण) | स्वभाव-परभाव   के भेद-प्रकाशक   (के स्मरण) के लिये स्वस्ति   (पुष्प   अर्पण) | तीनों लोकों के समस्त पदार्थों के ज्ञायक (के स्मरण)    के   लिये   स्वस्ति   (पुष्प अर्पण) |    (भूतभविष्यत्वर्तमानतीनों    कालों    में    समस्त   आकाश  में    फैले व्याप्त (के स्मरण) के   लिये   स्वस्ति   (पुष्प अर्पण)  |3|

द्रव्यस्य शुद्धिमधिगम्य यथानुरुपम् |

भावस्य शुद्धिमधिकामधिगंतुकामः ||

आलंबनानि विविधान्यवलम्बय वल्गन् |

भूतार्थ यज्ञ-पुरुषस्य करोमि यज्ञम् |4|

अर्थअपने   भावों   की    परम    शुद्धता   को पाने   का अभिलाषी मैं देश काल के अनुरुप जल चन्दनादि द्रव्यों को शुद्ध बनाकर जिन स्तवन, जिन बिम्ब दर्शन, ध्यान  आदि  अवलम्बों  का   आश्रय लेकर उन जैसा ही बनने हेतु पूजा के लक्ष्य (जिनेन्द्र भगवान की) की पूजा करता हूँ  |4|

अर्हत्पुराणपुरुषोत्तमपावनानि |

वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव ||

अस्मिन् ज्वलद्विमल-केवल-बोधवह्रौ |

पुण्यं समग्रमहमेकमना जुहोमि |5|

अर्थ उत्तम      पावन   पौराणिक महापुरुषों में सचमुच गुरुता, मुझ  में    लघुता    है,    (दोनों एक समान हैं)   इस भाव से अपना समस्त पुण्य  एकाग्र  मन   से   विमल केवल   ज्ञान   रुपी अग्नि में होम करता हूँ |5|

ह्रीं विधियज्ञ प्रतिज्ञायै जिनप्रतिमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपामि |

अर्थ - मैं जिनपुजन की प्रतिज्ञा करते हुए, जिनप्रतिमा के सामने पुष्प अर्पित (पीले चावल) करता हूं।

स्वस्ति मंगल विधान

श्री वृषभो न: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अजित:|

श्री संभव: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अभिनंदन:|

श्री सुमति: स्वस्ति, स्वस्ति श्री पद्मप्रभ:|

श्री सुपार्श्वः स्वस्ति, स्वस्ति श्री चन्द्रप्रभ:|

श्री पुष्पदंत: स्वस्ति, स्वस्ति श्री शीतल:|

श्री श्रेयांस: स्वस्ति, स्वस्ति श्री वासुपूज्य:|

श्री विमल: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अनंत:|

श्री धर्म: स्वस्ति, स्वस्ति श्री शांति:|

श्री कुंथु: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अरहनाथ:|

श्री मल्लि: स्वस्ति, स्वस्ति श्री मुनिसुव्रत:|

श्री नमि: स्वस्ति, स्वस्ति श्री नेमिनाथ:|

श्री पार्श्व: स्वस्ति, स्वस्ति श्री वर्द्धमान:|

अर्थ– श्री ऋषभ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री अजित जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री सम्भव जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री अभिनंदन जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री सुमति जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री पद्मप्रभ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री सुपार्श्व जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री चंद्रप्रभ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री पुष्पदंत जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री शीतलनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री श्रेयांसनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री वासुपुज्य जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री विमलनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री अनंतनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री धर्मनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री शांतिनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री कुंथुनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री अरनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री मल्लिनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री मुनिसुव्रत नाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री नमिनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री नेमिनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री पार्श्वनाथ जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो, 

श्री वर्धमान जिन हम सबके लिए है मंगलस्वरूप हो।

।इति श्रीचतुर्विंशति तीर्थंकर स्वस्ति मंगलविधानं पुष्पांजलिं क्षिपामि।।

अर्थ - मैं मंगल स्वरूप भरतक्षेत्र के वर्तमान चौबीस तीर्थंकर के चरणों में पुष्प (पीले चावल) अर्पित करता हूं।

परमर्षि-स्वस्ति-मंगल-विधान

18 बुद्धि ऋद्धियाँ

नित्याप्रकंपाद्भुत-केवलौघाः, स्फुरन्मनः पर्यय-शुद्धबोधाः

दिव्यावधिज्ञान-बलप्रबोधाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः

अन्वयार्थ - अविनाशी अचल अद्भुत केवल ज्ञान के धारक मुनिराज, दैदीप्यमान मन पर्यय ज्ञान रूप शुद्ध ज्ञान वाले मुनिराज और दिव्य अवधिज्ञान के बल से प्रबुद्ध महा ऋद्धि धारी ऋषि हमारा कल्याण करें।

1) [केवलज्ञान बुद्धि ऋद्धि]- सभी द्रव्यों के समस्त गुण एवं पर्यायें एक साथ देखने जान सकने की शक्ति

2) [मन:पर्ययज्ञान बुद्धि ऋद्धि]- अढ़ाई द्वीपों के सब जीवों के मन की बात जान सकने की शक्ति।

3) [अवधिज्ञान बुद्धि ऋद्धि]- द्रव्य, क्षेत्र, काल की अवधि (सीमाओं) में विद्यमान पदार्थो को जान सकने की शक्ति।

कोष्ठस्थ-धान्योपममेकबीजं, संभिन्न-संश्रोतृ-पदानुसारि

चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानाः, , स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥२॥

अन्वयार्थ : कोष्ठ-बुद्धि, एक-बीज, संभिन-संश्रोतृत्व और पादानुसारणी इन चार प्रकार की बुद्धि ऋद्धि को धारण करनेवाले ऋषीराज हम सबका मंगल करें।

4) [कोष्ठ-बुद्धि ऋद्धि] - जिस प्रकार भंडार में हीरा, पन्ना पुखराज चाँदी सोना धान्य आदि जहाँ रख दिए जावे बहुत समय बीत जाने पर यदि वे निकाले जावे तो जैसे के तैसे कम अधिक भिन्न भिन्न उसी स्थान पर रखे मिलते हैं जैसे ही सिद्धान्त न्याय व्याकरणादि के सूत्र गद्य पद्य ग्रन्थ जिस प्रकार पढे थे सुने थे पढ़ाये अथवा मनन किए थे बहुत समय बीत जाने पर भी यदि पूछा जाए तो एक भी अक्षर घट कर बढ़कर, पलट कर, भिन्न-भिन्न ग्रन्थों को सुना दे ऐसी शक्ति।

5) [एक बीज ऋद्धि]-  ग्रन्थों के एक बीज अर्थात् मूल पद के द्वारा उसके अनेक प्रकार के अर्थों को जान लेना।

6)[ संभिनसंश्रोतृत्व ऋद्धि]-  बारह योजन लम्बे नौ योजन चौड़े क्षेत्र में ठहरने वाली चक्रवर्ती की सेना के हाथी, घोड़ा, ऊँट, बैल, पक्षी, मनुष्य आदि सभी के अक्षर अनक्षर रूप नाना प्रकार के शब्दों को एक साथ अलग अलग सुनने की शक्ति  

7) [पादानुसारणी ऋद्धि] - ग्रन्थ के आदि के मध्य के या अन्त के एक पद को सुनकर सम्पूर्ण ग्रन्थ को कह देने की शक्ति

8) [दूर-स्पर्शन ऋद्धि]- मनुष्य यदि दूर से स्पर्शन करना चाहे तो अधिक से अधिक नौ योजन दूरी के पदार्थों का स्पर्शन जान सकता है। किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञानादि के बल से संख्यात योजन दूरवर्ती पदार्थ का स्पर्शन कर लेते है।

संस्पर्शनं संश्रवणं दूरादास्वादन-घ्राण-विलोकनानि

दिव्यान् मतिज्ञान-बलाद्वहंतः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥३॥

अन्वयार्थ- दिव्य मति ज्ञान के बल से दूर से ही स्पर्शन, श्रवण, आस्वादन, घाण और अवलोकन रूप पाँच इन्द्रियों के विषयों धारण करने वाले ऋषीराज हम लोगों का कल्याण करें।

9) [दूर-श्रवण ऋद्धि]- मनुष्य यदि दूरवर्ती शब्द को सुनना चाहे तो बारह योजन तक के दूरवर्ती शब्द सुन सकता है अधिक नहीं, किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञादि के बल से संख्यात योजन दूरवर्ती शब्द सुन लेते हैं। 

10 ) [दूर-आस्वादन ऋद्धि]- मनुष्य अधिक से अधिक नौ योजन दूर पदार्थों का रस जान सकता है किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञानादि के बल से संख्यात योजन दूर स्थित पदार्थ का रस जान लेते हैं। 

11) [दूर-घ्राण ऋद्धि]- मनुष्य अधिक से अधिक नौ योजन दूर स्थित पदार्थ की गंध ले सकता है किन्तु मुनिराज के बल से संख्यात योजन दूर स्थित पदार्थों की गंध जान लेते हैं।

12) [दूरावलोकन ऋद्धि]- मनुष्य अधिकतम सैतालीस हजार दो सौ त्रेसठ योजन दूर स्थित पदार्थ को देख सकता है, किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञानादि के बल से हजारों योजन दूर स्थित पदार्थों को देख लेते हैं।

प्रज्ञा-प्रधानाः श्रमणाः समृद्धाः, प्रत्येकबुद्धाः दशसर्वपूर्वैः

प्रवादिनोऽष्टांग-निमित्त-विज्ञाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥४॥

अन्वयार्थ- प्रज्ञा, श्रमण, प्रत्येक बुद्ध, अभिन्न-दशपूर्वी, चतुर्दश-पूर्वी प्रवादित्व, अष्टांग-महानिमित्तज्ञ मुनिवर हमारा कल्याण करें।

13)[ प्रज्ञा-श्रमणत्व ऋद्धि]- जिस ऋद्धि के बल से पदार्थों के अत्यन्त सूक्ष्म तत्वों को जिनकों की केवली एवं श्रुत केवली ही बतला सकते हैं द्वादशांग चौदह पूर्व पढ़े बिना ही बतला देते हैं।

14) [प्रत्येक बुद्ध ऋद्धि]- अन्य किसी के उपदेश के बिना ही जिस शक्ति के द्वारा ज्ञान संयम व्रत का विधान निरूपण किया जाता है।

15) [दशपूर्वित्व ऋद्धि]- दसवां पूर्व पढ़ने से अनेक महा-विद्याओं के प्रकट होने पर भी चारित्र से चलायमान नहीं होना

16) [चतुर्दश-पूर्वित्व ऋद्धि]- सम्पूर्ण श्रुत ज्ञान प्राप्त हो जाना। 

 

17) [प्रवादित्व ऋद्धि]- जिस शक्ति के द्वारा क्षुद्रवादियों की तो क्या यदि इन्द्र भी शास्त्रार्थ करने आए तो उसे भी निरुत्तर कर दे 

18) [अष्टांग-महानिमित्त ऋद्धि]- अन्तरिक्ष, भौम, अग, स्वर, व्यञ्जन, लक्षण, छिन्न, स्वप्न इन आठ महा-निमित्तों का ज्ञान

नौ चारण ऋद्धियाँ

जंघा-वह्नि-श्रेणि-फलांबु-तंतु-प्रसून-बीजांकुर-चारणाह्वाः

नभोऽगंण-स्वैर-विहारिणश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥५॥

अन्वयार्थ : जघा, अग्नि शिखा, श्रेणी, फल, जल, तन्तु, पुष्प, बीज, और अकुर पर चलने वाले चारण बुद्धि के धारक तथा आकाश में स्वच्छ विहार करने वाले मुनिराज हमारा कल्याण करें।

1) [जंघा - चारण ऋद्धि]- पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर आकाश में जंघा को बिना उठाये सैकड़ों योजन गमन करने की शक्ति

2) [अग्नि-शिखाचारण ऋद्धि]- अग्नि शिखा पर गमन करने से अग्नि शिखाओं में स्थित जीवों की विराधना नहीं होती। 

3) [श्रेणी-चारण ऋद्धि]- आकाश श्रेणी में गमन करते हुए सब जाति के जीव की रक्षा करना।

4) [फल- चारण ऋद्धि]- आकाश में गमन करते हुए फलों पर भी चले तो भी किसी प्रकार जीवों की हानि नहीं होती।

5) [जल-चारण ऋद्धिजल]- पर गमन करने से भी जीवों की हिंसा हो। 

6) [तन्तु-चारण ऋद्धि]- तन्तु अर्थात् मकड़ी के जाले के समान तन्तुओं पर भी चले तो वे टूटते नहीं। 

7) [पुष्प-चारण ऋद्धि]- फूलों पर गमन करने से उनमें स्थित जीवों की विराधना नहीं होती।

8) [बीजांकुर-चारण ऋद्धि]- बीजरूप पदार्थों एवं अंकुरों पर गमन करने से उन्हें किसी प्रकार हानि नहीं होती। 

9) [नभ-चारण ऋद्धि]- कायोत्सर्ग की मुद्रा में पद्मासन या खड़गासन में गमन करना

तीन बल ऋद्धियाँ

अणिम्नि दक्षाः कुशलाः महिम्नि, लघिम्नि शक्ताः कृतिनो गरिम्णि 

मनो-वपुर्वाग्बलिनश्च नित्यं, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥६॥

अन्वयार्थ- अणिमा, महिमा, लघिमा और गरिमा ऋद्धि में कुशल तथा मन, वचन, काय बल ऋद्धि के धारक मुनिराज हमारा कल्याण करें।

1) [मनो-बल ऋद्धि]- अन्तर्मुहूर्त में ही समस्त द्वादशांग के पदार्थों को विचार लेना। 

2) [वचन-बल ऋद्धि]- सम्पूर्ण श्रुत का अन्तर्मुहूर्त में पाठ कर लेना फिर जिव्हा, कंठ आदि में शुष्कता एवं थकावट होना।

3) [काय-बल ऋद्धि]- एक मास चातुर्मासिक आदि बहुत समय तक कायोत्सर्ग करने पर भी शरीर का बल कान्ति आदि थोड़ा भी कम  होना एवं तीनों लोकों को कनिष्ठ अगुली पर उठाने की सामर्थ्य का होना

ग्यारह विक्रिया ऋद्धियाँ

सकामरुपित्व-वशित्वमैश्यं, प्राकाम्यमन्तर्द्धिमथाप्तिमाप्ताः

तथाऽप्रतीघातगुणप्रधानाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥७॥

अन्वयार्थ- कामरूपित्व, वशित्व, ईशित्व, प्राकम्य, अन्तर्धान, आप्ति तथा अप्रतिघात विक्रिया ऋद्धि से सम्पन्न मुनिराज हमारा कुशल करें।

1) [अणिमा ऋद्धि]- परमाणु के समान अपने शरीर को छोटा बना लेना। 

2) [ महिमा ऋद्धि]- सुमेरु पर्वत से भी बड़ा शरीर बना लेना।

3) [लघिमा ऋद्धि]- वायु से भी हल्का शरीर बना लेना। 

4) [गरिमा ऋद्धि]- वज्र से भी भारी शरीर बना लेना।

5) [ कामरूपित्व ऋद्धि- एक साथ अनेक आकार वाले अनेक शरीरों को बना लेना।

6 ) [ वशित्व ऋद्धि]- तप बल से सभी जीवों को अपने वश में कर लेना। 

7) [ईशित्व ऋद्धि]- तीन लोक की प्रभुता होना।

8) [प्राकम्य ऋद्धि]- जल में पृथ्वी की तरह और पृथ्वी में जल की तरह चलना

9) [अन्तर्धान ऋद्धि]- तुरन्त अदृश्य होने की शक्ति।

10) [आप्ति ऋद्धि]- भूमि पर बैठे हुए ही अंगुली से सुमेरू पर्वत की चोटी सूर्य और चन्द्रमा को छू लेना। 

11) [अप्रतिघात ऋद्धि]- पर्वतों के मध्य से खुले मैदान के समान आना-जाना रुकावट आना।

सात तप ऋद्धियाँ

दीप्तं तप्तं तथा महोग्रं, घोरं तपो घोर पराक्रमस्थाः

ब्रह्मापरं घोर गुणाश्चरन्तः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥८॥

 

अन्वयार्थ- दीप्ति, तप्त, महाउग्र, घोर तप और घोर पराक्रम के तथा अघोर-ब्रह्मचर्य इन सात तप ऋद्धि के धारी मुनिराज हमारा कल्याण करें।

1) [दीप्ति ऋद्धि]- बड़े-बड़े उपवास करते हुए भी मनोबल, वचन बल का यवल का बढ़ना शरीर में सुगंधि आनासुगंधित निश्वास निकलना, तथा शरीर में भ्लानता होकर महा कान्ति का होना।

2) [तप्त ऋद्धि]- भोजन से मलमूत्र रक्त मांस आदि का बनना गरम कढ़ाही में पानी की तरह सूख जाना।

3) [महाउग्र ऋद्धि]- एक दो चार छह पक्ष मास उपवास आदि में से किसी एक को धारण करके मरण पर्यन्त छोड़ना 

4) [ घोर तप ऋद्धि]- भयानक रोगों से पीड़ित होने पर भी उपवास काय क्लेश आदि से नहीं हटना


5) [घोर-पराक्रम ऋद्धि]- दुष्ट राक्षस पिशाच के निवास स्थान भयानक जानवरों से व्याप्त पर्वत, गुफा श्मशान सूने गाँव में निवास करने वाले समुद्र के जल को सुखा देना एवं तीनों लोकों को उठा के फैंक देने की सामर्थ्य

6 ) [महाघोर ऋद्धि]- सिंह निक्रीडित आदि महा उपवासों को करते रहना।

7) [अघोर ब्रह्मचर्य ऋद्धि]- चिरकाल तक तपश्चरण करने के कारण स्वप्न में भी ब्रह्मचर्य से डिगना आदि विकार परिस्थिति मिलने पर भी ब्रह्मचर्य में दृढ रहना।

आठ औषधि ऋद्धियाँ

आमर्ष-सर्वौषधयस्तथाशीर्विषाविषा दृष्टिविषाविषाश्च

-खिल्ल-विज्जल-मलौषधीशाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥९॥ 

अन्वयार्थ - आमर्शोषधि, सर्वोषधि, आशी अविष, दृष्टि विष, वेलौषधि, विडोषधि, जल्लोषधि, मनीषधि, आशीविष रस, दृष्टि विष रस के थारी परम ऋषि हमारा कल्याण करें। 

1) [आमशॉषधि ऋद्धि]- जिनके हाथ पैर आदि को छूने से एवं समीप आने मात्र से ही सब रोग दूर हो जाए।

2) [सर्वोषधि ऋद्धि]- जिनके समस्त शरीरके स्पर्श करने वाली वायु ही समस्त रोगों को दूर कर देती है।

3) [आशीअविष ऋद्धि]- महाविष व्याप्त पुरुष भी जिनके आशीर्वाद रूप शब्द सुनने से निरोग या निर्विष हो जाता है। 

4) [दृष्टि (दष्टिनिर्विष) विष ऋद्धि]- महाविष व्याप्त पुरुष भी जिनकी दृष्टि से निर्विष हो जाए।

5) [क्ष्वेलौषधि ऋद्धि]- जिनके थूक, कफ आदि से लगी हुई हवा के स्पर्श से ही रोग दूर हो जावें। 

6) [विडौषधि ऋद्धि]- जिनके मल (विष्ठा) से स्पर्श की हुई वायु ही रोग नाशक हो

7) [जल्लौषधि ऋद्धि]- जिनके शरीर के पसीने में लगी हुई धूल महारोग नाशक होती है।

8) [मलीषधि ऋद्धि]- जिनके दात, कान, नाक, नेत्र आदि का मैल सर्व रोग नाशक होता है। 

छह रस ऋद्धियाँ एवं दो अक्षीण ऋद्धियाँ

क्षीरं स्रवंतोऽत्र घृतं स्रवंतः, मधु स्रवंतोऽप्यमृतं स्रवंतः

अक्षीणसंवास-महानसाश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥१०॥

अन्वयार्थ - क्षीरस्रावी, घृतस्रावी, मधुस्रावि, अमृतस्रावि तथा अक्षीण सवास और अक्षीण महानस ऋद्धि धारी मुनिवर हमारे लिए मंगल करें।

1) [आशीविष रस ऋद्धि- जिन मुनि के कर्म उदय से क्रोधपूर्वक मर जाओ शब्द निकल जाय तो वह व्यक्ति तत्काल हो जाता है।

2) [दृष्टि विष रस ऋद्धि] - मुनि की कोच पूर्ण दृष्टि जिस व्यक्ति पर पड़ जाये वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

3) [क्षीरस्त्रावी ऋद्धि] - नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही दूध के समान गुणकारी हो जाते अथवा जिनके वचन सुनने से क्षीण पुरुष भी दूध के समान बल को प्राप्त करे। 

4) [घृतस्रावी ऋद्धि]- नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही घी के समान बलवर्धक हो एवं जिनके वचन घृत के समान तृप्ति करें।

5) [मधुस्रावि ऋद्धि]- नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही मधुर हो जाए अथवा जिनके वचन सुनकर दुःखी प्राणी भी साता का अनुभव करे। 

6) [अमृतस्त्रावि ऋद्धि]- नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही अमृत के समान पुष्टि कारक हो जाए अथवा जिनके वचन अमृत के समान आरोग्य कारी हो

1) [अक्षीण संवास ऋद्धि]- जिनके निवास स्थान में इन्द्र देव, चक्रवर्ती की सैना भी बिना किसी परस्पर विरोध के ठहर सके उसे अक्षीण संवास ऋद्धि कहते है।

2) [अक्षीण महानस ऋद्धि]- ऋद्धिधारी मुनिराज जिस पात्र आहार करे उस दिन उस पात्र में बचा हुआ आहार चक्रवर्ती की सेना भी कर जाये तब भी आहार कम नहीं पड़े।

।।इति परमर्षि–स्वस्ति–मंगल–विधानं पुष्पांजलिं क्षिपामि।।

अर्थ - मैं परम इन 64 ऋद्धि प्राप्त ऋषियों की भक्ति करते हुए पुष्प (पीले चावल) अर्पित करता हूं।


--संकलित

श्री मंगलाष्टक स्तोत्र - अर्थ सहित

मंगलाष्टक

अर्हन्तो भगवत इन्द्रमहिताः, सिद्धाश्च सिद्धीश्वरा,
आचार्याः जिनशासनोन्नतिकराः, पूज्या उपाध्यायकाः
श्रीसिद्धान्तसुपाठकाः, मुनिवरा रत्नत्रयाराधकाः,
पञ्चैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं, कुर्वन्तु नः मंगलम्   ||1||

अर्थ – इन्द्रों द्वारा जिनकी पूजा की गई, ऐसे अरिहन्त भगवान, सिद्ध पद के स्वामी ऐसे सिद्ध भगवान, जिन शासन को प्रकाशित करने वाले ऐसे आचार्य, जैन सिद्धांत को सुव्यवस्थित पढ़ाने वाले ऐसे उपाध्याय, रत्नत्रय के आराधक ऐसे साधु, ये पाँचों  परमेष्ठी प्रतिदिन हमारे पापों को नष्ट करें और हमें सुखी करे!

श्रीमन्नम्र – सुरासुरेन्द्र – मुकुट – प्रद्योत – रत्नप्रभा-
भास्वत्पादनखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः
ये सर्वे जिन-सिद्ध-सूर्यनुगतास्ते पाठकाः साधवः
स्तुत्या योगीजनैश्च पञ्चगुरवः कुर्वन्तु नः मंगलम् ||2||

अर्थ – शोभायुक्त और नमस्कार करते हुए देवेन्द्रों और असुरेन्द्रो के मुकुटों के चमकदार रत्नों की कान्ति से जिनके श्री चरणों के नखरुपी चन्द्रमा की ज्योति स्फुरायमान हो रही है, और जो प्रवचन रुप सागर की वृद्धि करने के लिए स्थायी चन्द्रमा हैं एवं योगीजन जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधुये पांचों परमेष्ठी हमारे पापों को क्षय करें और हमें सुखी करें!

सम्यग्दर्शन-बोध-व्रत्तममलं, रत्नत्रयं पावनं,
मुक्ति श्रीनगराधिनाथ – जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः
धर्म सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं, चैत्यालयं श्रयालयं,
प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी, कुर्वन्तु नः मंगलम् ||3||

अर्थ – निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये पवित्र रत्नत्रय हैं श्रीसम्पन्न मुक्तिनगर के स्वामी भगवान् जिनदेव ने इसे अपवर्ग (मोक्ष) को देनेवाला कहा है इस त्रयी के साथ धर्म सूक्तिसुधा (जिनागम), समस्त जिन-प्रतिमा और लक्ष्मी का आकारभूत जिनालय मिलकर चार प्रकार का धर्म कहा गया है वह हमारे पापों का क्षय करें और हमें सुखी करे!

नाभेयादिजिनाः प्रशस्त-वदनाः ख्याताश्चतुर्विंशतिः,
श्रीमन्तो भरतेश्वर-प्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश
ये विष्णु-प्रतिविष्णु-लांगलधराः सप्तोत्तराविंशतिः,
त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्टि-पुरुषाः कुर्वन्तु नः मंगलम् ||4||

अर्थ – तीनों लोकों में विख्यात और बाह्य तथा अभ्यन्तर लक्ष्मी सम्पन्न ऋषभनाथ भगवान आदि 24 तीर्थंकर, श्रीमान् भरतेश्वर आदि 12 चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण और 9 बलभद्र, ये 63 शलाका महापुरुष हमारे पापों का क्षय करें और हमें सुखी करे!

ये सर्वौषध-ऋद्धयः सुतपसो वृद्धिंगताः पञ्च ये,
ये चाष्टाँग-महानिमित्तकुशलाः येऽष्टाविधाश्चारणाः
पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपि बलिनो ये बुद्धिऋद्धिश्वराः,
सप्तैते सकलार्चिता मुनिवराः कुर्वन्तु नः मंगलम् ||5||

अर्थ – सभी औषधि ऋद्धिधारी, उत्तम तप से वृद्धिगत पांच, अष्टांग महानिमित्त ज्ञानी,आठ प्रकार की चारण ऋद्धि के धारी, पांच प्रकार की ज्ञान ऋद्धियों के धारी, तीन प्रकार की बल ऋद्धियों के धारी, बुद्धि ऋद्धिधारी ऐसे सातों प्रकारों के जगत पूज्य गणनायक मुनिवर हमारा मंगल करे!

ज्योतिर्व्यन्तर-भावनामरग्रहे मेरौ कुलाद्रौ स्थिताः,
जम्बूशाल्मलि-चैत्य-शखिषु तथा वक्षार-रुप्याद्रिषु
इक्ष्वाकार-गिरौ च कुण्डलादि द्वीपे च नन्दीश्वरे,
शैले ये मनुजोत्तरे जिन-ग्रहाः कुर्वन्तु नः मंगलम् ||6||

अर्थ – ज्योतिषी, व्यंतर, भवनवासी और वैमानिकों केआवासों के, मेरुओं, कुलाचकों,जम्बू वृक्षों और शाल्मलि वृक्षों, वक्षारों विजयार्धपर्वतों,इक्ष्वाकार पर्वतों,कुण्डलवर (तथा रुचिक वर), नन्दीश्वर द्वीप, और मानुषोत्तर पर्वत के सभी अकृत्रिमजिन चैत्यालय हमारे पापों का क्षयकरें और हमें सुखी बनावें!

कैलाशे वृषभस्य निर्व्रतिमही वीरस्य पावापुरे
चम्पायां वसुपूज्यसुज्जिनपतेः सम्मेदशैलेऽर्हताम्
शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्यार्हतः,
निर्वाणावनयः प्रसिद्धविभवाः कुर्वन्तु नः मंगलम् ||7||

अर्थ – भगवान ऋषभदेव की निर्वाणभूमि – कैलाश पर्वत, महावीर स्वामी की पावापुर, वासुपूज्यस्वामी (राजा वसुपूज्य के पुत्र) की चम्पापुरी, नेमिनाथ स्वामी की ऊर्जयन्त पर्वत शिखर, और शेष बीस तीर्थंकरों की श्री सम्मेदशिखर पर्वत, जिनका अतिशय और वैभव विख्यात है ऐसी ये सभी निर्वाण भूमियाँ हमें निष्पाप बनावें और हमें सुखी करें!

यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो,
यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो यः केवलज्ञानभाक्
यः कैवल्यपुर-प्रवेश-महिमा सम्पदितः स्वर्गिभिः
कल्याणानि च तानि पंच सततं कुर्वन्तु नः मंगलम् ||8||

अर्थ – तीर्थंकरों के गर्भकल्याणक, जन्माभिषेक कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और कैवल्यपुर प्रवेश (निर्वाण) कल्याणक के देवों द्वारा सम्पादित महोत्सवहमें सर्वदा मांगलिक रहें!

इत्थं श्रीजिन-मंगलाष्टकमिदं सौभाग्य-सम्पत्करम्,
कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थंकराणामुषः
ये श्र्रण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैः धर्मार्थ-कामाविन्ताः,
लक्ष्मीराश्रयते व्यपाय-रहिता निर्वाण-लक्ष्मीरपि ||9||

अर्थ – सोभाग्य सम्पत्ति को प्रदान करने वाले इस श्री जिनेन्द्र मंगलाष्टक को जो सुधी तीर्थंकरों के पंच कल्याणक के महोत्सवों के अवसर पर तथा प्रभातकाल में भाव पूर्वक सुनते और पढ़ते हैं, वे सज्जन धर्म, अर्थ और काम से समन्वित लक्ष्मी के आश्रय बनते हैं और पश्चात् अविनश्वर मुक्तिलक्ष्मी को भी प्राप्त करते हैं!

Sunday, January 23, 2022

श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार - पद्यानुवाद


 श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार - पद्यानुवाद

(दोहा )

बाह्यान्तर लक्ष्मी सहित, वर्धमान जिनराज।

‘ज्ञायक’ लोकालोक के, नमन उन्हें शतबार।।1।।

स्वर्ग मोक्ष का सुख मिले, बाधा रहित वचन।

दुःख न किंचित् मात्र हो, ऐसा कहूँगा धर्म।।2।।

सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण, जिनवर कहिये धर्म।

यातैं जो विपरीत है, वे सब ही हैं कुधर्म ।।3।।

देव शास्त्र गुरु शरण गहे, सम्यक् हो श्रद्धान।

शास्त्रानुसार आचरण करे, सम्यग्दृष्टि जान ।।4।।

वीतराग सर्वज्ञता, हित उपदेशक जान।

निश्चय से गुरुवर कहे, उनको आप्त बखान।।5।।

भूखप्यास अरु जन्म मरण, आदि अठारह दोष।

जिनको ये नहीं होत हैं, सच्चे आप्त हैं होत।।6।।

परम इष्ट ज्योति विराग, विमल कृती व सार्व।

नादि मध्यान्त सर्वज्ञ, अष्ट नाम है आप्त।।7।।

ज्यों शिल्पी कर बजे मृदंग, कुछ भी न चाह करे।

त्यों हि राग रहित प्रभु, हित उपदेश खिरे ।।४।।

वीतराग सर्वज्ञ कथित, बाधा रहित है बैन।

सच्चा सब उपदेश है, जिनवाणी है ऐम।।9।।

विषयकषाय आरंभ अरु, परिग्रह रहित है जे।

ज्ञान ध्यान में रत रहे, सच्चे गुरु हैं वे।।10।।

जैसे आप्त आगम गुरु, उनका स्वरूप है जो।

वैसा ही श्रद्धान कर, नि:शंकित है वो ।।11।।

इन्द्रिय सुख वांछा नहीं, इन्द्रिय सुख तो हेय।

ऐसा जो श्रद्धान है, नि:कांक्षित है यह ।।12।।

वृती रोगी या मलिन देह, चाहे करे वमन ।

मन ग्लानि न ऊपजे, निर्विचिकित्सा अंग।।13।।

मिथ्यादेवागम गुरु, मिथ्यामार्ग है जो।

प्रमाण प्रशंसा न ऊचरे, अमूढ़दृष्टि है वो।।14।।

जो जिन ने आगम कहा, कोई लगावे दोष।

उसको जो निर्दोष करे, उपगूहन है वो।।15।।

सम्यग्दृष्टि धर्म से, चलायमान हो जाय।

धर्म में स्थिर करो, स्थितिकरण कहाय।।16।।

चार संघ जो हैं कहे, ज्ञानी धर्मी जान।

मिले परस्पर स्नेह हो, वात्सल्य अंग मान।।17।।

अज्ञानी जो जीव हैं, ताहि जिनुपदेश दे।

होगी धर्म प्रभावना, अंग प्रभावन है।।18।।

नि:शंकित अंजन हुआ, नि:कांक्षित अनन्तमती।

निर्विचिकित्सा उद्दायन, अमूढ दृष्टि रेवती।।19।।

उपगूहन जिनेन्द्र भक्त, स्थितिकरण वारिषेण।

प्रभावन वज्र कुमार है, विष्णु मुनि वात्सल्य।।

ये सब जो भी महापुरुष, सम्यक् के अष्टांग।

एक-एक में जो प्रसिद्ध, उनके हैं सब नाम।।20।।

ज्यों हीनाक्षर मंत्र से, मिटे न विष का कार्य।

त्यों हीनाङ्ग सम्यक्त्व से, मिटे न भव संताप ।।21।।

हिंसा नदी स्नान अरु, अग्नि हवन में धर्म।

लोक मूढ़ता है यही, जानो मिथ्या धर्म।।22।।

वर इच्छा की चाह से, जो पूजे कुदेव।

देव मुढ़ता उसे कहे, आगम में जिनदेव ।।23।।

हिंसा आरम्भ परिग्रह, सहित भ्रमे जो संत ।

पाखण्डी मार्ग चले, गुरु मूढ़ता वंत।।24।।

ज्ञान पूजा कुल जाति अरु, बल ऋद्धि तप रूप।

आठों मद से रहित जो, सम्यग्दृष्टि भूप।।25।।

बिन धर्मात्मा पुरुष के, न हो सकता धर्म।

अज्ञानी अपमान करे, होकर मद उन्मत्त।।26।।

अशुभ कर्म संवर हुआ, मुझको क्या है लाभ।

आस्रव भी यदि हो रहा, मुझको क्या है लाभ।।27।।

भस्म लगे अंगार को, कहते अग्नि मेव।

सम्यक्त्वी चाण्डाल हो, कहते उसको देव ।।28।।

कुत्ता पुण्य प्रभाव से, बन जाता है देव।

पाप प्रभाव अगर पडे, कुत्ता, बनता देव।।

त्यों हि धर्म प्रभाव से, प्राणी जन को अपार।

अहमिन्द्रों सी सम्पदा, मिलती अपरम्पार ।।29।।

भय आशा अरु लोभ से, कुगुरु कुदेव कुधर्म।

वन्दन जो भी न करे, सम्यग्दर्शनवन्त ।।30 ।।

सम्यग्ज्ञानचारित्र से, उत्तम सम्यग्दर्शन।

रत्नत्रय जग समुद्र में, तारे सम्यग्दर्श ।।31।।

जो अभाव में बीज के, वृक्ष उदय नहीं होय।।

त्यों हि सम्यग्दर्श विन, ज्ञान चारित न होय ।।32।।

मोह रहित गृहस्थ हो, मोह सहित है मुनीश।

उत्तम ऐसो गृहस्थ है, उत्तम नाहि मुनीष ।।33 ।।

तीन काल तिहुँ लोक में, कल्याणी सम्यक्त्व।

अकल्याणी जो कहा, वह है मिथ्या धर्म।।34।।


  **हरिगीत**

सहित सम्यग्दर्श है जो, नीच कुल में नाहिं हो।

नीच गति या अल्प आयु, दरिद्र अभद्र भी नाहिं हो।।35।।

ओज तेज सहित पराक्रम, वृद्धि यश सुख की रहे।

नायक सब मानुषों में, वे जीव सम्यक्द्रष्टि हैं।।36।।

अणिमा महिमा आदि आठों, गुण सहित जो जीव हैं।

उत्तम कहे सब देव से, वे जीव सम्यग्दृष्टि हैं ।।37 ।।

स्वर्ग की कर आयु पूरण, मनुज गति में जन्म ले।

अधिपति छह खण्ड का, वह बने सम्यग्दर्श से।।38।।

जो भी है सम्यक सहित, गणधर भी उनको वंदते।

वे धर्म चक्री मनुज वा, तीर्थंकर रूप में जन्मते ।।39।।

जन्म मरणादि रहित वह, मुक्ति निराकुल लहे।

शरण सम्यग्दर्श जिसको, सिद्ध पद भी वो लहे ।।40।।

जिन भक्ति अनुरागी हो, वह दृष्टि सम्यग्धारी हो।

देवेन्द्र राजेन्द्र तीर्थंकर, बाद में निर्वाण हो।।41।।

वस्तु को परिपूर्ण जाने, अधिक हो न कम कही।

वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहे, गणधर श्रुत केवली।।42।।

महापुरुष, त्रेसठ शलाका, की कथा जिन शास्त्र में।

प्रथमानुयोग ग्रन्थ हैं वे, जाने सम्यक्ज्ञान में ।।43।।

लोकालोक विभागकाल अरु, सारे करणानुयोग को।

जानता सब रूप से वह, ज्ञान सम्यक्ज्ञान हो।।44।।

घर में वैरागी तथा मुनि आचरण का ज्ञान है

जो ग्रन्थ चरणानुयोग में है, जानता सुज्ञान है।।45।।

दीपक समान प्रकाशता जो, द्रव्य अरु सब तत्व को।

वह ग्रंथ द्रव्यानुयोग है, सब जानता सुज्ञान हो ।।46।।

नाश मिथ्यातम किया, अब प्रगट में सम्यक्त्व है।

वे साधु रागादि मिटाने, धारते चारित्र हैं।।47।।

बिना धन की चाह के नर, राज काज नहीं करे।

त्यों राग द्वेष अभाव में, जीव हिंसादिक भी न करे।।48।।

हिंसास्तेय असत्य मैथुन, परिग्रह यह पाप है।

विरक्त इनसे ज्ञानी है, उत्तम चारित्र धारी है।।49।।

सर्व परिग्रह रहित मुनि के, सकल चारित्र है कहा।

गृहस्थ सम्यग्ज्ञानी है, उनके विकल चारित कहा।।50।।

शिक्षा गुण अणुव्रत त्रिरूप, चारित कहे गृहस्थ के।

चर्तु त्रि पंच भेद है, क्रमशः: जिनागम में कहे ।।51।।

हिंसास्तेय असत्यमेथुन, परिग्रह पंच पाप है।

स्थूल रूप विरक्त इनसे, उसे है अणुव्रती कहें।।52।।

त्रियोगपूर्वक कृत कारित अनुमोदना संकल्प से।

त्रस जीव घात करे न गृहस्थ, स्थूल हिंसा विरक्त है।।53।।

बंधन छेदन भेदन, अन्नपान निरोध हैं।

अतिभार रोपण पाँच यह, अहिंसाणुव्रत अतिचार है।।54।।

स्थूल असत्य न बोलता, बुलवाता है न किसी से।

कष्टदायी सत्य भी न कहे, स्थूल झूठ का त्यागी है।।55।।

परिवादरहोभ्याख्यान पैशुन्य कूटलेखन्यासापहारिता।

सत्याणुव्रत के पंच ये अतिचार जिनवर ने कहे।।56।।

रखी पड़ी या भूली वस्तु को उठाता जो नहीं।

उठाकर न अन्य को दे, स्थल चोरी त्याग है।।57।।

चोर प्रयोग चोरार्थादान, विलोप सदृश सन्मिश्र।

हीनाधिक मानोन्मान पंच स्थूल स्तेय अतिचार है।।56।।

स्वयं जाए न भेजे अन्य को, परस्त्री के पास में ।

स्व स्त्री संतोषी है जो, ब्रह्मचर्याणुव्रत जिनवर कहे ।।59।।

अन्य विवाह करण अनंग, क्रीडा विटत्वविपुलतृषा।

इत्वरिकागमन पंच ये अतिचार ब्रह्मचर्य व्रत के ।।60।।

धन धान्यादिक परिग्रह की नहीं इच्छा अधिक है।

परिमाण परिग्रह में रखे, परिमित परिग्रह व्रत है।।61।।

अतिवाहन संग्रहलोभ विस्मय, अतिभारवहन जो करे।

परिग्रह परिमाण व्रत के, पांच ये अतिचार हैं।।62।।

अतिचार रहित अणुव्रत सहित वह देवगति में जन्मता।

अणिमादि ऋद्धि सहित दिव्य देह की है प्राप्तता ।।63।।

मातङ्ग धनदेव वारिषेण अरु नीली जय कुमार है।

जो पाँचों अणुव्रत में ही क्रमशः प्रसिद्ध पूज्य हुए हैं।।64।।

धनश्री सत्य घोष तापसी कोतवाल नवनीत ये।

पांचों पापों में क्रम से, प्रसिद्ध दुर्गति प्राप्त है।।65।।

मधुमद्यमांस त्यागी अरु, पंच अणुव्रत धारी है।

वहअष्ट मूलगुण धारी है, श्रुतकेवली गणधर कहे।।66।।

दिग्व्रत अनर्थदण्ड भोगोपभोगपरिमाण तीन ये।

अणुव्रत में गुण वृद्धि करे सो गुणव्रत गणधर कहे।।67।।

परिमाण दश दिशाओं में कर, उल्लंघन न करे जो।

पाप निवृत्ति में लगे, दिग्व्रत नामक गुणव्रती ।।68।।

सागर नदी पर्वत देश, योजनादि दिशाओं में ।

परिमाण कर न उल्लंघन, दिग्व्रत धारी जीव है।।69।।

धारी जो दिग्व्रत का वह पाप किंचित् न करे।

बस इसलिए अणुव्रत उसके महाव्रत में परिणमे ।।70।।

सकल नहीं संयम कषाय प्रत्याख्यान उदय है।

बस इसलिए अणुव्रती रहे, महाव्रत की है बस कल्पना।।71।।

कृत कारित अनुमोदना, त्रियोग पूर्वक हिंसादि।

पापों में न प्रवर्ते वे महाव्रत के धारी हैं ।।72।।

उर्ध्वातिपात अध:स्ताति क्रमतिर्यग्व्यतिक्रम है अरु ।

क्षेत्रवृद्धि विस्मरण दिग्व्रत पंच अतिचार है ।।73।।

मर्यादित दिशाओं में त्रियोग की न व्यर्थ ही।

प्रवृत्ति हो भगवन उसे, अनर्थदण्ड व्रत कहते हैं ।।74।।

अपध्यान हिंसादानपापोपदेशदुःश्रुति अरु ।

प्रमादचर्या पंच अनर्थ दण्ड ये गणधर कहे।।75।।

तिर्यंच को दे क्लेश, अरु क्रय विक्रय उनका करे।

ऐसी प्रवृत्ति रूप हिंसोपदेश पापोपदेश है।।76।।

विक्रय करे किराए पे दे असि आदि हिंसा उपकरण।

छुरी आदि का दे दान हिंसा दान अनर्थदण्ड है।।77।।

द्वेष से या वैर से, हिंसा करे जो अन्य की।

या हिंसा का चिंतन करे, अपध्यान अनर्थदण्ड है।।78।।

आरम्भ साहस संग मद मिथ्यात्व अवधि रागद्वेष।

मदन रूपी शास्त्र श्रवण, दु:श्रूति अनर्थदण्ड है। ।।79।।

बिन प्रयोजन भूमि खोदे, अग्नि या जल छिड़कता।

वायु फूंके वनस्पति छेदन प्रमाद चर्या है।।80।

कंदर्प मौखर्य अरु, कौत्कुञ्च अति प्रसाधन।

असमीक्ष्याधिकरण पंच अतिचार अनर्थदण्ड है।।81।।

पंच इन्द्रिय विषय में, आसक्ति कम करना जिन्हें।

सीमा सीमित करे भोगोपभोग परिमाण व्रत है।।82।।

आए एक बार भोगने में, भोजनादि भोग है जो।

बार-बार ही भोगे इन्द्रिय, विषय वह उपभोग है।।83।।

जिनशरण को प्राप्त है, जो जीव सम्यग्दृष्टि है।

मद्य मांस अरु मधु का, उनके सदा परित्याग है।।84।।

प्रयोजन हो सिद्ध अल्प, बहुघात जीवों का करे।

ऐसे कन्दमूल सेवन त्याग वह भी व्रत है ।।85।।

देह को अनिष्ट है जो तथा सेवन योग्य ना।

अनुपसेव्य अनिष्टकारक त्याग वह भी व्रत कहा।।86।।

भोगोपभोग परिमाण व्रत के यम नियम दो भेद हैं।

देह पर्यन्त त्याग यम मर्यादा पूर्वक नियम है।।87।।

भोगोपभोग परिमाण व्रत में, नित्य ही कुछ नियम हो।

रस आदि व्यंजन त्याग एकासन आदि नियम हो।।88।।

एक घड़ी मुर्हत प्रहर दिन रात्रि पक्ष इक माह ऋतु।

आदि समय परिमाण करके त्यागना वह नियम है।।89।।

अतिलौल्य अनुप्रेक्षास्मृति तृष्णा अनुभव पाँच ये।

अतिचार भोगोपभोग परिमाण व्रत के है ये कहे।।90।।

देशावकाशिक प्रोषधोपवास सामायिक औ वैयावृत्त्य।

ये चार शिक्षाव्रत कहे, जिनदेव ने जिनवाणी में।।91।।

अणुव्रती के काल की, मर्यादा जो कि विशाल है।

नित्य किंचित न्यून कर, देशावकाशिक व्रत कहे।।92।।

गृह मोहल्ला ग्राम नदी वन क्षेत्र योजन सीमा में।

जो अपनी सीमा कम करे देशावकाशिक व्रती कहे।।93।।

देशावकाशिक है व्रती जो, चार छह दो माह अरु ।

इक वर्ष पक्ष नक्षत्र में भी, काल मर्यादित करे।।94।।

देशावकाशिक व्रती को, परिमाण क्षेत्र के बाह्य में।

हिंसादि का सब त्याग हो तो महाव्रत की सिद्धि हो।।95।।

शब्द प्रेषण आनयनरूपाभिव्यक्ति और पुद्गल-

क्षेप पंच अतिचार ये देशावकाशिक व्रत कहे।।96।।

त्यागी है सर्वत्र जो, हिंसादि का त्रियोग से।

सामायिक उसके कहा ऋषिवर गणधर देव ने।।97।।

केश मुष्टि वस्त्र आसन बांधकर एकान्त में।

मर्यादापूर्वक शुद्ध आतम ध्यान हो सामायिक में।।98।।

विक्षेप विरहित थान हो, वन बाग गृह अरु चैत्य में।

एकांत में शुद्धात्म में, परिचय वहाँ सामायिक हो।।99।।

काय क्रिया मन तथा विकल्प से भी रहित हो।

उपवास आदिक व्रतों में, सामायिक करने बैठिये।।100।।

अहिंसादिव्रत की पूर्णता का कारण है सामायिक।

जो पुरुष नियमित आत्म से परिचय करे एकाग्र हो।।101।।

सामायिक के काल में गृहस्थ परिग्रह रहित है।

उपसर्ग वस्त्र सहित मुनि के सम ही उनका भाव है।।102।।

सामायिक करे गृहस्थ तो योग चंचल न करे।

शीतोष्णदंशमशकादि जीवाजीव कृत उपसर्ग सहे।।103।।

अनात्मा अनित्य अशरण अशुभ यह संसार है।

स्व भूल से में भ्रम रहा अनादि से संसार में ।।104।।

मन वचन काय दु:प्राणिधान अनादर अरु अस्मरण।

यह पाँच सामायिक अतिचार जिन कहे निजवचन में।।105।।

अष्टमी अरु चतुर्दशी या रात्रि में जिनपर्व में।

आहार चारों प्रकार का हो त्याग प्रोषधोपवास में।।106।।

उपवास में हिंसादि व आरम्भ आदि न करे ।

देह से सजना तथा गृह कार्य को भी छोड़ दे।।107 ।।

उपवास में आलस न हो, बस ज्ञान ध्यान ही करे।

रुचि पूर्वक धर्म का श्रवण वाचन भी करे ।।108 ।।

अशन खाद्य स्वाद्य पान यह चार कवलाहार है।

त्याग इनका करे जब उपवास होता जीव के ।।

पश्चात् पूर्व उपवास के दिन भोज करे इक बार ही।

सोलह प्रहर के पूर्व भोजारंभ से भी त्याग हो।।109।।

अदृष्ट ग्रहण विसर्ग अन्तर अनादर अरु अस्मरण।

टालना है पाँच ये अतिचार हैं उपवास के।।110।।

दान वैयावृत्य धर्म अरु तप ही जिनका धन कहा।

अनपेक्षितोपचार की ही क्रिया शिक्षाव्रत में है।।111।।

संयमी की अनेकों आपत्तियों को दूर कर।

चरण मर्दन तथा गुण अनुराग वैयावृत्य है।।112।।

सप्त गुण से सहित नवधा भक्ति से आहार दे।

आरम्भ विरहित ज्ञानी मुनि को उसे आहार दान है ।।113।।

ज्यों देह के मल रुधिर का प्रक्षाल होता नीर से।

त्यों कर्म मल प्रक्षाल हो मुनि पूजा दान सम्मान से।।114।।

सम्यग्धारी तप निधानी देह से निर्मम जिन्हें ।

वैभव तथा सम्यक्त्व हो भोगभूमि में उत्पन्न हो।।115।।

सुपात्र को दे दान जो मिथ्यात्व में भी हो अगर।

वैभव तथा सम्यक्त्व हो भोगभूमि में उत्पन्न हो।।116।।

आहार औषध उपकरण आवास चारों दान से।

हो वैयावृत्य चार प्रकार चतुरस्त्र ज्ञानी ने कहा।।117।।

आहार औषध अभय शास्त्र चारों दानों से क्रमश: ।

श्रीषेण वृषभ सेना शूकर कौण्डेश प्रसिद्ध है।।118 ।।

देवाधिदेव अरहंत के चरणों की पूजा नित्य कर।

कामादि दुःख को नष्ट कर मनवांछित फल को प्राप्त कर।।119।।

राजगृह के नगर में जिनपूजन के भाव में।

हो मस्त इक मेंढ़क मरा तो स्वर्ग में वह देव है।।120।।

अनादर अस्मरण मत्सरत्व हरित निधान पिधान।

ये पाँच अतिचार दान के जो टालते वे भव्य है।।121।।

न इलाज हो यदि रोग का दुर्भिक्ष हो उपसर्ग हो।

तब धर्म रक्षा के लिए देह त्याग वह सल्लेखना।।122।।

अन्त क्रिया से यदि संन्यासी व्रत से रहित हो।

तो सारा तप ही विफल सो सल्लेखना ही योग्य है।।123।।

बैर संग स्नेह परिग्रह त्याग मन को शुद्ध कर।

सबको क्षमा सबसे क्षमा सल्लेखना के पूर्व ले।।124।।

अपराध यदि कृत-कारित अरु अनुमोदना से भी किया।

तो मरण पर्यन्त महाव्रत लो वीतरागी गुरु से।।125।।

संन्यास में भय, शोक आदिक कायरपन छोड़कर।

आत्म सत्त्व प्रकाश ज्ञानामृत से मन को प्रसन्न कर।।126।।

आहार छोड़ दूध पी फिर दूध छोड़ छाछ ले।

फिर छाछ तज कर गर्म पानी ले यदि सल्लेखना।।127।।

फिर गर्म जल भी छोड़कर उपवास दो करना अरु।

नवकार मंत्र स्मरण पूर्वक देह त्याग कीजिए।।128।।

जीवित मरणाशंस भय अरू मित्र स्मृति निदान ।

ये पंच है अतिचार तज सल्लेखना के जिन कहे।।129।।

सल्लेखना से मरण हो, वह ज्ञानी सम्यग्दृष्टि हो।

धर्माचरण से सहित बह, निर्वाण सुख को प्राप्त है।।130।।

जन्म रोग जरा मरण दु:ख शोक भय संयोग से।

रहित केवल शुद्ध नित्य सुखी वह निःश्रेयस है।।131।।

स्वास्थ्य शक्ति शुद्धि अरु सहित अनन्त चतुष्क है।

हे परम वीतरागी वे निर्वाण पद को प्राप्त हैं।।132।।

लीन है निज आत्म में जो अनन्तानन्त काल से।

उन सिद्ध प्रभु को नहीं आता, विकार कभी निजआत्म में।।133।।

निःश्रेयस है जो जीव वे तो कर्म मल से रहित हैं।

कांति छवि के धारी वे निर्वाण लक्ष्मी को वरे।।134।।

इंन्द्रादि पद भी प्राप्त हो, सम्यक धर्म समाधि से।

पूजा धन ऐश्वर्य बल सम्यक् धर्म से प्राप्त हो ।।135।।

ग्यारह कहे स्थान श्रावक धर्म के जिनदेव ने।

पूर्व के स्थान के गुण सहित क्रम बढ़ते रहे।।136।।

संसारी हैं जो दोष विरहित विषय भोग विरक्त हो।

परमेष्ठी अरु तत्त्व की श्रद्धा उसे श्रावक कहो।।137।।

माया मिथ्या निदान शल्य अतिचार से भी रहित हो।

बारह व्रतों का धारी श्रावक व्रतियों में वृती हो।।138।।

नवकार मंत्र के पूर्व में अरु अन्त में कायोत्सर्ग।

परिग्रह रहित दिक् चार में प्रणाम तीन आवर्त कर।

देव वन्दन पूर्व में दो बार शीश नवाइये।

त्रि बार दिन में नित्य ही कर वन्दना सामायिक हो।।139।।

चतुर्दश अरु अष्टमी नीरस आहार व छाछ लो।

शुभध्यान में उपवास हो तो प्रोषधोपवास जान लो।।140।।

कंदमूल अरु बीज का भक्षण करे न निरर्गल।

श्रावक सचित्तविरत नामक पाँचवाँ पद जानना।।141।।

बनाया हो रात्रि में वह भोज या चारों आहार।

त्याग रात्रि में करें तो रात्रि भुक्ति विरत है।।142।।

दूर्गन्धयुत मल पिण्ड जाने इस अशुचि देह को।

तब काम भाव विरत हो तो ब्रह्मचारी जीव है।।143।।

हिंसा करण है कृषि वाणिज्य असि आदि कर्म।

सब त्याग हो जिस जीव के आरम्भ निवृत्त श्रावक है ।।144।।

देहादि से ममत्व न रागादि से भी रहित जो।

संतोषधारी परिग्रह का त्याग परिग्रह त्याग है।।145 ।।

आरम्भ आदि बाह्य किया में न कर अनुमोदना।

अनुमति भी देय न अनुमति व्रत का धारी हो।।146।।

सब परिग्रह त्याग कर बस खण्ड ही वस्त्र रखो।

मुनि सम मुनि के संग रहे उत्कृष्ट श्रावक जीव वे।।147।।

पाप वैरी को तजे धारण करे जो धर्म को।

निज शुद्ध आत्म स्वरूप जाने उसका ही कल्याण हो।।148।।

जब आत्म को कलंक विरहित रत्नकरण्ड प्राप्त हो।

सब अर्थ उसके सिद्ध हो ज्यों स्त्री को हो पति से।।149।।


        **रोला**

कामिनी से सुखी हुआ जो कामी पुरुष है।

जननी जो पालन करती है अपने पुत्र का।।

शीलवती करती है जैसे कुल पवित्र त्यों।

सम्यग्दर्शन सुख पवित्रता मुझे प्रदान हो।।150।।



नित्य नियम पूजा पीठिका की वचनिका

  पं. सदासुखदास जी कासलीवाल कृत नित्य नियम पूजा पीठिका की वचनिका ॐ नमः सिद्धेभ्य: मूल पाठ -  अथ नित्य नियम पूजन की वचनिका लिख्यते।...