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जिनप्रतिमा प्रक्षाल-पाठ

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  (दोहा) जिनप्रतिमा प्रक्षाल से, होते निर्मल भाव। इसीलिए नित मैं करूं, जिनप्रतिमा प्रक्षाल।। (वीरछंद) प्रात: जल्दी उठकर के मैं णमोकार को ध्याता हूं। जिनप्रतिमा प्रक्षालन के शुभ भाव हृदय में लाता हूं।। शुद्ध अखंडित वस्त्र पहनकर, जिनमन्दिर में आया मैं। प्रासुक जल पट शुद्ध साथ ले, सजा थाल में लाया मैं।। जिनप्रतिमा को देख सहज ही, भाव हुए निर्मल मेरे। जिनप्रतिमा प्रक्षाल भाव से, पाप गले सारे मेरे।। सर्वप्रथम मैं शुद्ध  सु पट  ले, प्रतिमा परिमार्जन कर लूं। सूक्ष्म जीव की रक्षा होवे, यही भाव हृदय धर लूं।। प्रासुक जल से भीगा पट ले, प्रतिमा प्रक्षालन कर लूं। स्वच्छ रहे जिनप्रतिमा मेरी, यही भावना उर भर लूं।। शुष्क शुद्ध पट लेके हाथ में, प्रतिमा का प्रक्षाल करूं। नमी जरा भी न रह जाए, पूर्ण सावधानी रक्खूं।। जिनप्रतिमा प्रक्षाल समय, मैं जिनस्तुति का गान करूं। जिनसम शुद्ध चिदातम मैं भी, अपना शुद्ध स्वभाव लखूं।। इसीतरह जिनप्रतिमाओं का, नित प्रक्षालन किया करूं। मैं भी जिनसम बन जाऊंगा, यही भावना हृदय धरूं।। (दोहा) जिनप्रतिमा प्रक्षाल कर, गंधोदक शिरधार। वीतराग पद पाऊं मैं, यही भावना सार।।

मेरी मम्मा

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 मेरी मम्मा मैंने दुनिया की सबसे बड़ी हस्ती  देखी है। अपनी मां के रूप में एक अद्भुत शक्ति देखी है।। यूं तो कठिनाइयां बहुत थी उनके जीवन में। किन्तु अनेक समस्याओं में भी मैने  अपनी मां मुस्कुराती देखी है।। घर की जिम्मेदारी और बच्चों की चिन्ता। समस्त कार्यों के बीच मन ऐसा उलझता।। अनेक मुश्किलों से अकेले लड़ते देखी है। बचपन से मैने एक अद्भुत शक्ति देखी है।। हमें पढ़ाया, लिखाया और काबिल बनाया। हर समस्या से लड़ना मां तूने सिखाया।। हंसते, खेलते और सोते समय भी। जीवन की शिक्षाएं तूने हमें दी।। भविष्य की चिंताओं के बीच मुस्कुराती देखी है। बचपन से मैने एक अद्भुत शक्ति देखी है।। जीवन में संस्कार के बीज डाले। जिनधर्म महिमा हृदय में संवारे।। जिनदर्शन -पूजन, व्रतादिक सिखाया। नीति से जीना मां तूने सिखाया।। मैने मां के रूप में गुरु मां देखी है। बचपन से मैने एक अद्भुत शक्ति देखी है।। हे जन्मदाता, हे संस्कारदाता, हे शिक्षा प्रदाता, मेरी प्रिय माता।। तेरे जन्म दिन पर मेरी भावना है। तू जन्मादि नाशे यही कामना है।। मैं ही हूं भगवन ये स्वीकार करके,  इस स्त्री पर्याय से मुक्त होके। पुरुष बन,...

कानजीस्वामी (सोनगढ़िया पंथ ) और वर्तमान दिगम्बर जैन पंथ में क्या अन्तर है...

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कानजी स्वामी कौन है वो दिगम्बर जैन है अथवा श्वेताम्बर? कानजी स्वामी का जन्म गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के एक छोटे से गाँव उमराला में 1890 में एक स्थानकवासी परिवार में हुआ था। हालाँकि वह अपने विद्यालय में एक योग्य छात्र थे, लेकिन उन्हें हमेशा यह आभास होता था कि सांसारिक शिक्षाएँ ऐसी चीज़ नहीं थीं जिनकी उन्हें तलाश थी। जब वह तेरह वर्ष के थे तब उनकी माँ का देहांत हो गया और सत्रह वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद, उन्होंने अपने पिता की दुकान संभालनी शुरू कर दी। उन्होंने दुकान में खाली समय का उपयोग धर्म और अध्यात्म पर विभिन्न पुस्तकें पढ़ने में किया। शादी के प्रस्तावों को ठुकराते हुए, उन्होंने अपने भाई से कहा कि वह ब्रह्मचारी रहना चाहते हैं और संन्यास लेना चाहते हैं। वे बालपन से ही साधु-सन्तों को देखकर प्रसन्न होते थे, उनकी वैयावृत्ति करना तथा उनसे जिनवाणी का ज्ञान प्राप्त करना उन्हें अच्छा लगता था, मुक्ति की अभिलाषा को लिए हुए अधिक समय धार्मिक समय वातावरण में बीते यह विचारकर उन्होंने भी स्थानकवासी सम्प्रदाय में दीक्षा ग्रहण की, तब दीक्षा उत्सव के समय गजराज हाथी पर सवार...

धर्म और परम्परा एक सामान्य परिचय

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  धर्म शाश्वत है और परम्पराएं परिवर्तनशील होती है  अर्थात् बदलती रहती है ।  कोई भी द्रव्य हो, कोई भी क्षेत्र हो, कोई भी काल हो, और कोई भी भाव हो, धर्म कभी नहीं बदलता , सदा एक जैसा ही रहता है, जैनदर्शन के दिगम्बर संत कार्तिकेय मुनिराज ने कहा है "वत्थु सहावो धम्मो" अर्थात् वस्तु का स्वभाव धर्म है और स्वभाव वो होता है जो सदा एक जैसा रहे, जिसका कभी नाश न हो, जैसे शक्कर का स्वभाव है मिठास जो कभी नहीं बदलता।  किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी भी क्षेत्र में, किसी भी काल में, किसी भी भाव में शक्कर अपनी मिठास को कभी नहीं छोड़ती, यदि मिठास ही न हो, तो शक्कर भी नहीं होगी। इसलिए वही उसका स्वभाव है और वही उसका धर्म है उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव है ज्ञान-दर्शन आदि जानना-देखना जो की सदैव रहता है निगोद में भी जीव अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता और स्वभाव ही धर्म है तथा धर्म सदैव शाश्वत होता है।  किन्तु परम्परा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के अनुसार बदलती रहती है, कभी किसी व्यक्ति के कारण से, किसी क्षेत्र के कारण से, किसी समय के कारण से अथवा किसी परिणाम के कारण से कोई एक नियम, रीति अथवा परम...

विवाह योग्य युवक के मन में अपने लिए योग्य कन्या के सन्दर्भ में विचार :-

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वो एक लड़की जो मेरी लाइफ में आएगी

खुश रहना वास्तव में कितना सरल है

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वर्तमान में सभी को ये जीवन बड़ा ही कष्टमय लगता है, सभी लोग दुःखी है, सबके दु:खों के अपने-अपने, अलग-अलग कारण है धनवान हो, अथवा निर्धन, नामी, प्रतिष्ठित व्यक्ति हो अथवा इससे रहित कोई बेनाम अप्रतिष्ठित व्यक्ति सभी दुःखी है।  और हमारे दुःखों मूल कारण है व्यर्थ के सपने, व्यर्थ की इच्छाएं, सबको अपने हिसाब से चलाने की सोच।   विचार कीजिए कि आज सबके बड़े-बड़े सपने है, अनेकों इच्छाएं है, किसी को डॉक्टर बनना है, किसी को इंजीनियर बनना है, किसी को सी.ए. बनना है, किसी को इंस्पेक्टर बनना है, किसी को कलेक्टर बनना है, किसी को विश्वप्रसिद्ध गायक बनना है, किसी को विश्वप्रसिद्ध नर्तक बनना है, किसी को विश्वप्रसिद्ध तिरनबाज बनना है, किसी को विश्वप्रसिद्ध खिलाड़ी बनना है, किसी को चांद पर जाना है, किसी को मंगल तो किसी को सूरज पर जाना है, जिसको देखो वो अपने आप को बहुत ऊंचाई पर देखना चाहता है वह भी मात्र इसलिए कि दुनियां हमें जाने, लोग हमारी प्रशंसा करें उसके लिए दिन-रात बिना कुछ सोचे गधे की तरह मेहनत करता है और पूरी जिन्दगी मेहनत करने पर भी लक्ष्य का मिलना तो पुण्य के आधीन है और यदि मिल भी ग...

रेस में मत भागो, विचार पूर्वक आगे बढ़ो

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  फिल्म के डायलॉग में भी शिक्षा योग्य बातें होती है - लोगों तक नेक कार्य पहुंचने चाहिए किसने किया इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।  ~ फिल्म - ध्रुव जगन्नाथ (DJ) इसलिए हमारे जैनाचार्यों ने जंगल में मोक्षमार्ग के प्ररूपक शास्त्र लिखें जिससे की हम उन्हें पढ़कर मोक्षमार्ग में आगे बढ़ें। किन्तु उन्होंने उसमे अपने विषय में कुछ नहीं लिखा और हम अज्ञानी जीव, आचार्य ने जो शास्त्र में मोक्षमार्ग लिखा है, शुद्धात्मा की प्राप्ति का जो उपाय लिखा है उसे समझने के बजाय कौन सा शास्त्र किसने लिखा, कब लिखा उनके गुरु कौन थे, शिष्य कौन थे, उनकी गृहस्थ अवस्था कैसी थी, उनके माता-पिता, चाचा-मामा आदि रिश्तेदार कौन थे बस इसी में रुचि लेते है।  यहां तक कि विद्यालय में भी हमें क्या करना चाहिए ये सिखाने के बजाय किसने, कौन से समय में, कौन से स्थान पर क्या झंडे गाड़े थे बस यही सिखाया जाता है। कौन बनेगा करोड़पति जैसे टी.वी. शो में भी इसी की बात होती है।  तो कोई संस्कार की बात क्यों सीखना चाहेगा और कौन सिखाना चाहेगा? वर्तमान में अच्छे कामों को याद रखना या अच्छे काम सीखने के बजाय केवल नौकरी, इनाम अथवा प्रसिद...