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Showing posts from November, 2021

बारह भावना

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            (तर्ज:- में अपूर्व कार्य करूंगा) आतम है मेरा शुद्ध बुद्ध उस ही को ध्याऊंगा। जान लिया संसार बारह भावन भाऊंगा।।टेक।। संसार में पर्याय अनंतों धारण कर ली है। लेकिन दो.. समय भी कोई ना रुकी है। आतम ही है नित्य बस उसी को ध्याऊंगा। जान लिया संसार बारह भावन भाऊंगा।।१।। देह के रिश्तेदार बहुत ही बन रहे। लेकिन दुख में कोई भी न काम आ रहे। निज आतम है शरण निज शरणार्थी बनूंगा। जान लिया संसार बारह भावन भाऊंगा।।२।। संसार सारा देख है सुख नहीं कुछ भी। अपने घर से ज्यादा सुख नहीं कहीं भी। अब तो नित अपने निज घर में ही रहूंगा। जान लिया संसार बारह भावन भाऊंगा।।३।। मित्र शत्रु तात माता रिश्तेदार हैं। मुझमें नहीं कोई यह सब तो व्यवहार है। एकाकी हूं मैं सदा एकाकी रहूंगा। जान लिया संसार बारह भावन भाऊंगा।।४।। मोहोदय के कारण सबको अपना ही माने। जब देह ही अपनी नहीं तो कौन कहां ठाने। सबसे हूं मैं भिन्न अब तो भिन्न रहूंगा। जान लिया संसार बारह भावन भाऊंगा।।५।। सौ बार सफाई करें फिर भी मलिन ही रहे। ऐसे अशुचि देह में अब कैसे हम रहे। परम पवित्र है आत्मा अब उसमें रहूंगा। जान लिया स...

वर्तमान में गुरुदेव श्री कानजी स्वामी

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दुनियां में एक पिता का नाम रोशन भी उनका बेटा करता है, और नाम बदनाम भी बेटा करता है, वैसे ही एक गुरु का नाम रोशन भी उनके शिष्य करते है, और बदनाम भी उनके शिष्य ही करते है। गुरुदेव श्री कानजी स्वामी ने दिगम्बर शास्त्रों का गहराई से अध्ययन किया और उसे जीवन में भी अपनाया। गुरुदेवश्री की तो जैनसिद्धांतों में कोई भूल नहीं थी, लेकिन उनके कुछ अनुयायियों ने छोटी-छोटी बातों को इतना तो चलता है, के नाम पर चलाना शुरू कर दिया जिसके कारण देखने वालों को लगा कि गुरुदेव ने ऐसा सिखाया इसलिए गुरुदेव गलत हो गए। गुरुदेव तो जिनवाणी के अनुसार शुभभाव को कथन्चित् हेय बताते थे, कथन्चित् उपादेय बताते थे। पूजन पाठ से धर्म नहीं होता कहते थे, किन्तु खुद स्वयं मन्दिर में शुद्ध वस्त्र पहनकर पूजन-पाठ, भक्ति किया करते थे, लेकिन उनके कुछ अनुयायियों ने अपनी सुविधा के लिए उसमें भी क्रिया में अशुद्धता फैलाना शुरू कर दी। कहने लगे कि क्रियाओं से धर्म नहीं होता, शुभभाव से धर्म नहीं होता। जिसके कारण देखने वालों को लगा कि गुरुदेव ने ऐसा सिखाया इसलिए गुरुदेव गलत हो गए। गुरुदेव श्री कानजी स्वामी ने कभी किसी वर्तमान मुनि का विरोध नह...

दैनिक पाठ (नित्य भावना)

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   ( वीरछंद )  तर्ज :- जब एक रतन अनमोल है तो ..  तीनकाल   और   तीनलोक   के ,   जितने   वीतराग   महंत।  हुए ,   हो रहे ,   और   होऐंगे ,   सबको   मेरा   नमन   अनंत।।  तीनलोक   के   क्रत्रिम - अक्रत्रिम ,    चैत्यालय - चैत्य सभी।  वंदन   उन्हें   अनन्त   हमारा ,   सम्यक्दर्शन   होए   अभी।।  ढाईद्वीप   में ,   वर्तमान   में ,      संघ   चतुर्विध   है   जितने।  नमन हमारासदा सभी को , यथायोग्य   हम   करें विनय।।   चतुर्संघ   की      चर्या       निर्मल ,    वीतराग    परिणति    होवे।    निरंतराय  प्रासुक   आहार हो, सुलभ  मोक्षमार्ग होवें।।    तीनलोक   में   जिन  जीवों   को , जो भी कष्ट हुआ जिनसे।   क्षमा भाव सब ...

जैनपर्वों के सम्बन्ध में कुछ चिन्तन:-

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  पर्व अर्थात् त्यौहार जिन्हें संसार में खुशियों के दिन कहां जाता है।  जैनदर्शन में दो तरह के पर्व है:- त्रैकालिक और तात्कालिक। त्रैकालिक:- अर्थात् जो अनादि-अनन्त है। हमेशा से मनाए जा रहे है और हमेशा मनाए जाएंगे।   जैसे:- दशलक्षण महापर्व, अष्टान्हिका महापर्व।  तात्कालिक;- अर्थात् जो किसी विशेष अच्छी या बुरी घटना के कारण, उस घटना की याद में कुछ समय तक मनाए जाते है, और कालान्तर में समय के साथ उन घटनाओं का विस्मरण हो जाता है। जैसे:- महावीर निर्वाणोत्सव, रक्षाबंधन, महावीर जयंती, सभी तीर्थंकरों के कल्याणक, जन्मदिन इत्यादि विशेष दिन।  जो बाते सब लोग जानते है, और मानते भी है, में उन विषयों में ज्यादा नहीं कहना चाहता किन्तु कुछ ऐसी बाते जो जानते तो सब है किन्तु स्वीकार नहीं कर पाते, त्यौहारों को मनाते तो बड़ी उत्सुकता से है, बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाते है, किन्तु अज्ञानवश पर्व के सही मतलब को समझे बिना परम्परा के अनुसार ही मनाते है। में उस विषय में यहां लिखना चाहता हूं।  ताकि सब लोग जैनपर्व को मनाएं तो उचित तरीके से समझकर सही स्वरूप से मनाएं। सबसे पहले...

जिनप्रतिमा का प्रक्षाल-पूजन क्यों व कैसे एक चिंतन

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  अभिषेक व प्रक्षाल किसका करना चाहिए? दिगम्बर जैन तेरापंथ आम्नाय के अनुसार वास्तव में परिग्रह रहित वीतराग मार्ग को प्रदर्शित करने वाली ऐसी कुशल प्रतिष्ठाचार्य द्वारा पंचकल्याणक अथवा वेदीप्रतिष्ठा में जिनागम के अनुसार वर्णित विधि-विधान पूर्वक जिनालय में प्रतिष्ठित जिनप्रतिमा तथा यंत्र जी अथवा दिगम्बर मुनिराज के प्रतिष्ठित चरण इत्यादि का प्रक्षाल किया जाता है, इसके अलावा पंचमेरू होते है जो कि अप्रतिष्ठित होते है किन्तु उनमें भी जिनबिम्ब होते है, अप्रतिष्ठित होते है पर उनका भी उसी विधि से प्रक्षालन किया जाता है। अभिषेक-प्रक्षाल का उद्देश्य :- जैन परम्परा में दिगम्बर मुनि का भी स्नान इत्यादि का त्याग होता है, हमारे यहां तो थोड़ा भी जल बेकार नहीं जाना चाहिए ऐसा सिखाया जाता है, वस्तु का उतना ही उपयोग होना चाहिए जितना आवश्यक है, चरणानुयोग के अनुसार एक सामान्य श्रावक को भी अपने दैनिक कार्यों में कम से कम पानी का उपयोग करना चाहिए। तो यदि किसी को ऐसा लगता है कि भगवान को नहलाया जाता है उसे अभिषेक कहते है तो ये बिल्कुल गलत है ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, दिगम्बर मुनि के ही स्नान का त्याग है तो हम अ...