क्षमावाणी महापर्व:-
क्षमावाणी का महापर्व ये, कैसे इसे मनाऊं, सोच रहा हूं कब से मैं ये, कैसे इसे मनाऊं। मैंने जैसा देखा अब तक, वह मैं तुम्हें सुनाऊं, क्षमावाणी का मतलब मैंने, जो समझा बतलाऊं।। देखा सबको दशलक्षण में, पूजन-भक्ति करते, क्रोध नाश कर, क्षमा भाव रख, प्रवचन में ये सुनते। इक विद्वान कहे प्रवचन में, क्रोध छोड़कर क्षमा करें, नौकर से क्या गलती हो गयी, क्रोधी बन खुद क्रोध करे। स्वाध्यायी तो बहुत ही देखे, पूजन-प्रक्षाल करते है, पर क्रोध-मान इतना कि, ठीक से बात तक न करते है। दो मिनट पहले ही तो, सबको क्षमा बोला था, सबसे क्षमा मांग-मांग कर अपने मन को धोया था।। दो मिनट के बाद ही देखो, कैसा प्रसंग आया, जिससे मांगी थी क्षमा, उस पर ही क्रोध आया।। सब लोग दिखावा करते है, पर मुझसे नहीं होता है, कितनी कोशिश की है मैंने, कषाय भाव न जाता है, माता-पिता की बात न मानी, गुरुजनों की नहीं सुनी, कैसे मांगू क्षमा में उनसे, ग्लानि मन में भरी हुई, हर वर्ष मैं क्षमा मांगता, पर अब भी मैं वैसा ही हूं। नहीं बड़ो की बात मानता, अपने मन की करता हूं। सबको क्षमा, सबसे क्षमा, यह कहने से नहीं होता है, परिणाम...