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Showing posts from September, 2021

क्षमावाणी महापर्व:-

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क्षमावाणी का महापर्व ये, कैसे इसे मनाऊं, सोच रहा हूं कब से मैं ये, कैसे इसे मनाऊं। मैंने जैसा देखा अब तक, वह मैं तुम्हें सुनाऊं, क्षमावाणी का मतलब मैंने, जो समझा बतलाऊं।। देखा सबको दशलक्षण में, पूजन-भक्ति करते, क्रोध नाश कर, क्षमा भाव रख, प्रवचन में ये सुनते। इक विद्वान कहे प्रवचन में, क्रोध छोड़कर क्षमा करें, नौकर से क्या गलती हो गयी, क्रोधी बन खुद क्रोध करे। स्वाध्यायी तो बहुत ही देखे, पूजन-प्रक्षाल करते है,  पर क्रोध-मान इतना कि, ठीक से बात तक न करते है। दो मिनट पहले ही तो, सबको क्षमा बोला था, सबसे क्षमा मांग-मांग कर अपने मन को धोया था।। दो मिनट के बाद ही देखो, कैसा प्रसंग आया, जिससे मांगी थी क्षमा, उस पर ही क्रोध आया।। सब लोग दिखावा करते है, पर मुझसे नहीं होता है,  कितनी कोशिश की है मैंने, कषाय भाव न जाता है,  माता-पिता की बात न मानी, गुरुजनों की नहीं सुनी,  कैसे मांगू क्षमा में उनसे, ग्लानि मन में भरी हुई,  हर वर्ष मैं क्षमा मांगता, पर अब भी मैं वैसा ही हूं। नहीं बड़ो की बात मानता, अपने मन की करता हूं। सबको क्षमा, सबसे क्षमा, यह कहने से नहीं होता है, परिणाम...

उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म:-

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ब्रह्म शब्द का अर्थ होता है आत्मा और चर्य अर्थात् चर्या, अर्थात् लीनता, अर्थात् अपनी ही आत्मा में जम जाना, रम जाना, लीन हो जाना वह वास्तव में निश्चय से उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म है। तथा इस उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म में अर्थात् आत्मलीनता में बाधक जो पंचेंद्रिय के विषय है उनका पूर्णत: त्याग, अर्थात् पंचेंद्रिय के विषयों पर विजय प्राप्त करना वह व्यवहार से उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म है।  वर्तमान में सामान्य रूप से ब्रह्मचर्य की जब-जब बात चलती है तो बस एक ही बात पर ध्यान जाता है, एक स्पर्शन इन्द्रिय के त्याग को ही वर्तमान में ब्रह्मचर्य समझा जाता है, अथवा स्त्री सेवन त्याग को ही ब्रह्मचर्य मान लिया जाता है। उसमें भी पूर्णरूप से स्त्रीसेवन त्याग को लोग नहीं समझ पाते, बल्कि मात्र एक क्रियाविशेष मैथुन नाम की क्रिया के त्याग को ही ब्रह्मचर्य माना जाता है। जबकि ऐसा नहीं है। आचार्यों ने ग्रन्थों में आत्मलीनता में बाधक जो पंचेंद्रिय के विषय है उनका पूर्णत: त्याग, अर्थात् पंचेंद्रिय के विषयों पर विजय प्राप्त करना वह व्यवहार से उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म है, ऐसा कहा है। कहीं-कहीं ग्रन्थों में स्पर्शन इन्द्रिय के त्या...

उत्तम आकिंचन्यधर्म :-

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आ अर्थात् नहीं है किंच् अर्थात् किंचित मात्र भी, अन्य अर्थात् कुछ भी अन्य मेरा। अर्थात् मेरे ज्ञानादी अनंत गुणों के अलावा इस संसार में अन्य कुछ भी मेरा नहीं है, ऐसा ज्ञान, ऐसा निर्णय, ऐसा अनुभव इसका नाम वास्तव में उत्तम आकिंचन्य धर्म है। जिसप्रकार क्षमा का विरोधी क्रोध और मार्दव का विरोधी मान है उसीप्रकार आकिंचन्य का विरोधी है परिग्रह अर्थात् परिग्रह के अभाव को उत्तम आकिंचन्य कहते है। आकिंचन्य का दूसरा नाम अपरिग्रह भी हो सकता है। पदार्थों के प्रति ममत्व का भाव रखना परिग्रह है ! संसारी चीज़ों (ज़मीन,मकान,पैसा,पशु,गाड़ियां, कपड़े इत्यादि) को आवश्यकता से अधिक रखना और इन्हे और ज्यादा बढ़ाने/पाने की इच्छा रखना परिग्रह है ! समस्त पापों का मूल कारण परिग्रह है ! जिनागम में 24 परिग्रह का वर्णन आता है। अंतरंग और बहिरंग के भेदों से परिग्रह 24 प्रकार का है :- (क) अंतरंग परिग्रह :- रागादि रूप अंतरंग परिग्रह 14 प्रकार का होता है ! 1- मिथ्यात्व, 4- कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) और, 9- नो-कषाय (हास्य, रति, आरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद) (ख) बहिरंग परिग्रह :- सांसारिक व...

उत्तम त्यागधर्म:-

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अधिकतर संसार में ऐसा समझा जाता है कि अपनी किसी वस्तु का त्याग कर देना, त्याग है, या कुछ दान करना वह त्याग कहलाता है।  किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है, अपनी वस्तु का कभी त्याग होता ही नहीं है और जो अपना नहीं है उसे अपना मानकर जो भूल हम अनादि से करते आ रहे है बस उस मान्यता का त्याग ही वास्तव में उत्तम त्याग कहलाता है। वास्तव में तो दान का भी सही स्वरूप अभी लोग नहीं समझते है। करोड़ो की बोली लेना, जहां पैसे की आवश्यकता ही नहीं है वहां भी व्यर्थ में पैसा बर्बाद करना उसे दान समझा जाता है जबकि ऐसा भी नहीं है। दान भी पात्र और सुपात्र को दिया जाता है, अपात्र अथवा कुपात्र को नहीं। बहुत सी जगह पर मैने देखा है कि जहां वैसे ही सब करोड़पति लोग है पैसे की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता ना होने पर भी लाखों का दान देकर स्वयं को धन्य समझता है, और कहीं धन की बहुत आवश्यकता है, छोटा गांव है, समाज की कमी है, धन की कमी है, जिनमन्दिर का जीर्णोद्धार कराना है, वहां ये धनी व्यक्ति दान नहीं करना चाहता। पैसे वहां देना चाहता है जहां बहुत नाम हो, जहां आवश्यकता है वहां देता नहीं है और जहां आवश्यकता नहीं है किन्तु देने प...

उत्तम तपधर्म:-

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  उत्तम तपधर्म की चर्चा जब भी चलती है तो एक बहुत ही प्यारा सूत्र याद आता है,  इच्छानिरोधोस्तप:। अर्थात् इच्छाओं का अभाव ही वास्तव में उत्तम तप कहलाता है। वर्तमान में व्रत उपवास इत्यादि को समाज में तप समझा ज्यादा जाता है, जो जितने उपवास करता है वो उतना तपस्वी कहलाता है। जबकि लोग तो उपवास का भी सही अर्थ नही समझ पाते। उपवास अर्थात् अपनी आत्मा के समीप वास करना।  लोग व्रत उपवास करते है और साथ में घर के व्यापार के अनेक कार्य भी करते है, कषाय भी नहीं छोड़ पाते तो वह उपवास वास्तव में उपवास रहता ही भी वह तो लंघन बन जाता है। उपवास का अर्थ भोजन का त्याग नहीं अपितु विषय-कषायों का त्याग है। उत्तम तप को यदि समझना है तो जिनागम में 2 प्रकार से उत्तम तप का वर्णन आता है।  व्यवहारतप और निश्चय तप। व्यवहारतप:- व्यवहारतप 2 प्रकार का है,  बाह्य तप और अंतरंग तप।  बाह्य तप 6 प्रकार का है :- अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रस परित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश। 1 - अनशन:- आत्म साधना के लिऐ  विकल्प रहित उपवास को यानि ४ प्रकार के आहार का त्याग करने को अनशन तप कहते है। 2 -...

उत्तम संयमधर्म :-

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उत्तम संयमधर्म को हम 2 प्रकार से समझ सकते है। व्यवहार संयम और निश्चय संयम व्यवहार उत्तम संयमधर्म:-  व्यवहार संयम 2 प्रकार का होता है:-  1. इन्द्रिय संयम 2. प्राणी संयम 1. इन्द्रिय संयम:- पञ्चेंद्रिय और मन के विषयों की इच्छा का त्याग होना आवश्यक है यदि यह जीव पंचेंद्रियों के विषयों में उलझा रहेगा तो स्वयं के ज्ञान स्वभाव और अतीन्द्रिय आनन्द को कभी जान नहीं पाएगा, इसलिए प्रथम तो पंचेंद्रिय अर्थात् स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण ये पांच इन्द्रिय तथा मन के विषयों की रुचि का त्याग कर अपने आत्मस्वभाव की ओर अग्रसर होना इन्द्रिय संयम है। 2. प्राणी संयम:- प्राणी संयम अर्थात् भूमिकानुसार षट्काय के जीवों की रक्षा का भाव अर्थात् जीवदया का भाव हृदय में होना अत्यंत आवश्यक है। षट्काय के जीव अर्थात् पांच स्थावर तथा एक त्रस जीव।  पांच स्थावर :- पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक ये पांच स्थावर सभी एकेंद्रिय जीव है।   त्रसजीव :- दो इन्द्रिय से पांच इन्द्रिय के सभी जीव उन्हें त्रस जीव कहते है। इन सभी प्रकार के जीवों की रक्षा का भाव होना ये प्राणी संयम...

उत्तम शौचधर्म:-

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शौच अर्थात् शुचिता अर्थात् पवित्रता। मेरा आत्मतत्व समस्त संसार में सबसे पवित्र पदार्थ है किन्तु अनादिकाल की भूल और अज्ञान के कारण ये जीव स्वयं की अनंतशक्ति, अपने अनन्तगुण, तथा अनंत पवित्रता को भूलकर पर वस्तुओं के पीछे भागता रहता है, चाहे वह परवस्तु कितनी ही अपवित्र क्यों ना हो फिर भी उसके पीछे भागता है और इसके मन का लोभ, इसके मन का लालच इतना बढ़ जाता है कि लालच के कारण परवस्तु की प्राप्ति की इच्छा में ये कोई भी पाप करने से नहीं चूकता, बड़े से बड़ा पाप करने को तैयार रहता है। और फिर उन पापों के फल में अधोगति में जाकर गिरता है। ये अज्ञानी जीव शरीर को सजाने में इस शरीर की सुरक्षा के लिए, दिन-रात अनंत प्रयास करता है, और ये शरीर जो कि महा अपवित्र पदार्थ है, उसकी इस जीव को महिमा आती है, उस शरीर में ये अपनापन समझता है, इस अपवित्र शरीर के प्रति ये में हूं ऐसी मिथ्याबुद्धि अनादिकाल से इस जीव में पड़ी हुई है और स्वयं जो संसार का सबसे पवित्र, परमपवित्र चेतनतत्व आत्मा है उसकी इसे खबर ही नहीं है। यदि शौचधर्म इस जीव को अंतर में प्रगट करना है तो पर वस्तुओं का लोभ छोड़ना होगा, लालच का पूर्णत: त्याग करन...

उत्तम सत्यधर्म:-

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सत् की पहचान ही वास्तव में उत्तम सत्यधर्म होता है। वर्तमान में बहुत से संसारी जीवों जो लगता है की सच बोलना ही सत्यधर्म है, किन्तु वास्तव में देखा जाए तो सच बोलना ये तो लोकव्यवहार है, नैतिकता है, अच्छी बात है, किन्तु धर्म नहीं है। अच्छी बात है, नैतिकता है इसलिए लोकव्यवहार में उसे धर्म कह दिया जाता है। किन्तु यहां जो सत्यधर्म का स्वरूप है, वह कुछ अलग ही है, सत्य अर्थात् सत् अर्थात् किसी भी वस्तु की सत्ता की स्वीकृति उसका नाम सत्य धर्म है। वर्तमान में संसार में बहुत से लोगों को लगता है, आत्मा-परमात्मा इत्यादि कुछ नहीं होता, स्वर्ग-नरक इत्यादि कुछ नहीं होता, कुएं के मेंढ़क की भांति जो कुछ, जितना दिखाई देता है उसी को अज्ञानी जीव संसार समझते है इससे आगे भी कुछ हो सकता है इस पर विचार ही नहीं कर पाते। और जो ज्ञानी जीव ये समझता है, कि में अनंतज्ञान-अनंतसुख जैसे अनन्त गुणों का पिंड हूं। मेरी सत्ता इस संसार में विद्यमान है, सुख दुःख रूप जीव की अवस्था पुण्य-पाप, गति-कुगती, ये संसार, ये सत् है इस संसार की सारी व्यवस्था स्व-संचालित व्यवस्था है, प्रत्येक द्रव्य यहां स्वतंत्र है, अपनी योग्यता से, अपने...

उत्तम आर्जवधर्म :-

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आर्जव अर्थात् ऋजुता अर्थात् सरलता, वास्तव में सरल स्वभावी आत्मा की सरलता, उसका स्वभाव, वही वास्तव में उत्तम आर्जवधर्म है। ये सरलता हम सभी में सदैव से शक्कर में मिठास और निम्बू में खटास की भांति कण-कण में व्याप्त है, प्रत्येक जीव में यह सरलता नामक गुण पूर्णरूप से व्याप्त है। किन्तु अपने अनादि की भूल के कारण, अपनी अज्ञानता के कारण हम अपने सरल स्वभाव को पहचान ही नहीं पाते, समझ ही नहीं पाते, बल्कि इसके विपरीत जो परपदार्थ है, जिनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है ऐसे उन परपदार्थों की प्राप्ति की इच्छा के कारण उसे पाने के लिए अनेक तरह के प्रयास करते है, और जो वस्तु पाने की योग्यता ही ना हो, पुण्य भी ना हो, हमारे भाग्य में वो वस्तु ना हो तो भी उसके लिए, उसे पाने के लिए भी अनेक तरह के छल-कपट करते है, मायाचार के परिणाम करते है।  यही तो नहीं करना है, यही तो गलत है, हम चाहते है कि संसार की हर वस्तु जो मुझे प्रिय है, वो मेरी हो जाए, में हर वस्तु को प्राप्त कर लूं और ऐसे विचार पूर्वक अनेक तरह के षड्यंत्रों को ये जीव करता है और एक वस्तु प्राप्त हो भी जाए तो भी इसकी इच्छा का अंत नहीं...

उत्तम मार्दवधर्म :-

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मार्दव अर्थात् मृदुता , कोमलता , विनम्रता जो कि आत्मा का स्वभाव है। और वही मृदु स्वभाव आत्मा का धर्म है उसे ही मार्दव धर्म कहते है। किन्तु इस संसार में अनादिकाल से ही ये जीव अपने मृदु स्वभाव को भुला हुआ है और कोमलता के विपरीत मान कषाय को ही हितरूप जानकर निरंतर मान बढ़ाने के प्रयत्न करता है। जिसके कारण से इसमें एक अजीब सी अकड़ उत्पन्न हो जाती है , ये सबसे बड़ा दिखना चाहता है , ऊंचा दिखना चाहता है , सबसे आगे और सबसे ऊपर जाने की होड़ इसमें सदैव रहती है , सबको अपने से नीचा देखकर इसे आनन्द होता है , और इसी कारण से इसके अंदर में मृदुलता अर्थात् कोमलता के अभाव रूप और मान कषाय के सद्भाव रूप क्रूरता जन्म लेती है , ये जीव अपनी प्रशंसा दूसरों से सुनना चाहता है , अपनी प्रशंसा सुनने के लिए ये जीव किसी भी हद तक जा सकता है कुछ भी कर सकता है। जो व्यक्ति संसार में दूसरों से अपनी प्रशंसा सुनने कि आशा रखता है , इच्छा रखता है वास्तव में कोई भी प्...